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सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

नवरात्रि विशेष : हत्था जोड़ी

नवरात्रि विशेष : हत्था जोड़ी
अगर आपको स्टॉक मार्किट में फैयदा नहीं हो रहा है या मेहनत करने पर भी धन की प्राप्ति नहीं होती काम बिगड़ जाते है ,अगर व्यापार न चल पा रह हो यां जीवन में उन्नति न हो पा रही हो ,कई बार इर्षा के कारण कुछ लोग तंत्र प्रयोग कर देते हैं जिससे दूकान में ग्राहक नहीं आते यां कार्य सफल नहीं होते.
यह हत्था जोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी तांत्रिक वस्तु है ।मुकदमा ,शत्रु संघर्ष ,दरिद्रता ,व दुर्लभ आदि के निवारण में इसके जैसी चमत्कारी वस्तु आज तक देखने में नही आई इसमें वशीकरण को भी अदुभूत शक्ति है , भूत दृप्रेत आदि का भय नही रहता यदि इसे नवरात्रि / शुभ दिन में तांत्रिक विधि से सिध्द कर दिया जाए तो साधक निष्चित रूप से चामुण्डा देवी का कृपा पात्र हो जाता है यह जिसके पास होती है उसे हर कार्य में सफलता मिलती है धन संपत्ति देने वाली यह बहुत चमत्कारी साबित हुई है तांत्रिक वस्तुओं में यह महत्वपूर्ण है ।
हत्था जोड़ी में अद्भुत प्रभाव निहित रहता है, यह साक्षात चामुंडा देवी का प्रतिरूप है. हत्था जोड़ी से सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा ,शत्रु दमन तथा मुकदमो में विजय हासिल होती है !
तिजोरी में सिन्दूर युक्त हत्था जोड़ी रखने से आर्थिक लाभ में वृद्धि होने लगती है.
कभी धन की याचना नहीं करनी पड़ती अपितु धन उसकी और स्वयं ही आकर्षित होता रहता है …और धन-सम्पति, वशीकरण, शत्रु शमन मे व्यक्ति सशक्त हो जाता है l जिस व्यक्ति के पास यह होती है l उसे किसी बात कि कमी नहीं होती l उसकी लगभग सभी इछचाये पूर्ण हो जाती है l

स्कंदमाता पांचवा नवरात्रा:-

स्कंदमाता पांचवा नवरात्रा:-
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नवरात्र पर पांचवे दिन माँ के स्कंदमाता के रूप की पूजा की जाती है l स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माँ है | नौ ग्रहों की शांति के लिए स्कंदमाता की खास पूजा अर्चना की जाती है l ऐसामन जाता है कि नवरात्र के पांचवे दिन स्कंदमाता को खुश करने से बुरी ताकतों का नाश होता है और बुरी नज़र से मुक्ति मिलती है l देवी के इस रूप कि पूजा से असंभव काम भी संभव हो जाते हैं l 


उपाय (1) :-विवाह में आने वाली बाधा दूर करने के लिए ये उपाय बहुत ही कारगर है | 36 लौंग और 6 कपूर के टुकड़े लें | इसमे हल्दी और चावल मिलाकर इससे माँ दुर्गा को आहुति दें

उपाय (2) :-अगर आपको संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो आप लौग और कपूर में आनार के दाने मिला कर माँ दुर्गा को आहुति दें जरुर लाभ होगा | संतान प्राप्ति का सुख मिलेगा |

उपाय (3) :-अगर आप का कारोबार ठीक से नहीं चल रहा है तो दूर करने के लिए लौंग और कपूर में अमलताश के फूल मिलाएं ,अगर अमलताश नहीं है तो कोई भी पीला फूल मिलाएं और माँ दुर्गा को आहुति दें आपका बिजनेस खूब फलेगा

उपाय (4) :-जिन लोगों की विदेश यात्रा में कठिनाई या बाधा आ रही है |वो मूली के टुकड़ों को हवन सामग्री में मिला लें और हवन करें | विदेश यात्रा का योग बनेगा।

कैसे करें नवरात्रि की महाष्टमी पर चंडी हवन

कैसे करें नवरात्रि की महाष्टमी पर चंडी हवन
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यूं तो चंडी हवन किसी भी दिन व किसी भी समय संपन्न हो सकता है। लेकिन महाष्टमी के दिन हवन से पहले कुंड का पंचभूत संस्कार करें।

सर्वप्रथम कुश के अग्रभाग से वेदी को साफ करें। कुंड का लेपन करें गोबर जल आदि से। तृतीय क्रिया में वेदी के मध्य बाएं से तीन रेखाएं दक्षिण से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खींचें, चतुर्थ में तीनों रेखाओं से यथाक्रम अनामिका व अंगूठे से कुछ मिट्टी हवन कुण्ड से बाहर फेंकें। पंचम संस्कार में दाहिने हाथ से शुद्ध जल वेदी में छिड़कें। पंचभूत संस्कार से आगे की क्रिया में अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदेव का पूजन करें।
इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें : -

ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नेय न मम।
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ विष्णवे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम।
ॐ श्रियै स्वाहा। इदं श्रियै न मम।
ॐ षोडश मातृभ्यो स्वाहा। इदं मातृभ्यः न मम॥


नवग्रह के नाम या मंत्र से आहुति दें। गणेशजी की आहुति दें। सप्तशती या नर्वाण मंत्र से जप करें। सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के पश्चात स्वाहा का उच्चारण करके आहुति दें। प्रथम से अंत अध्याय के अंत में पुष्प, सुपारी, पान, कमल गट्टा, लौंग 2 नग, छोटी इलायची 2 नग, गूगल व शहद की आहुति दें तथा पांच बार घी की आहुति दें। यह सब अध्याय के अंत की सामान्य विधि है।

तीसरे अध्याय में गर्ज-गर्ज क्षणं में शहद से आहुति दें। आठवें अध्याय में मुखेन काली इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुति दें। पूरे ग्यारहवें अध्याय की आहुति खीर से दें। इस अध्याय से सर्वाबाधा प्रशमनम्‌ में कालीमिर्च से आहुति दें। नर्वाण मंत्र से 108 आहुति दें।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

नवरात्रि : किस कन्या के पूजन का क्या मिलेगा फल

नवरात्रि : किस कन्या के पूजन का क्या मिलेगा फल
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हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शारदीय नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व माना गया है। खास तौर पर अ‍ष्टमी तथा नवमी तिथि को 3 से 9 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करने की परंपरा है। यह कन्याएं साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप मानी जाती है। जानिए नवरात्रि में इन कन्याओं के पूजन से क्या लाभ प्राप्त होता है :-
* दो वर्ष की कन्या को कौमारी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसके पूजन से दुख और दरिद्रता समाप्त हो जाती है।
* तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है। त्रिमूर्ति के पूजन से धन-धान्य का आगमन और संपूर्ण परिवार का कल्याण होता है।
* चार वर्ष की कन्या कल्याणी नाम से संबोधित की जाती है। कल्याणी की पूजा से सुख-समृद्धि मिलती है।
* पांच वर्ष की कन्या रोहिणी कही जाती है। रोहिणी की पूजन से व्यक्ति रोग मुक्त होता है।
* छह और सात वर्ष की कन्या चण्डिका के पूजन से ऐश्वर्य मिलता है।
* आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी की पूजा से लोकप्रियता प्राप्त होती है।
* नौ वर्ष की कन्या दुर्गा की अर्चना से शत्रु पर विजय मिलती है तथा असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

नवरात्रों में करें गणेशजी के इस मंत्र का स्मरण, तुरंत बनेंगे सारे काम

नवरात्रों में करें गणेशजी के इस मंत्र का स्मरण, तुरंत बनेंगे सारे काम
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बुधवार को गणेश जी की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म के मुताबिक भगवान गणेश जी को सिद्धि और मंगलकारी शक्तियों का स्वरूप माना जाता है। इसीलिए हर शुभ काम की शुरूआत भगवान गणेश जी की आरती के साथ की जाती है। बुधवार के दिन गणेश जी की उपासना करने से सुखी सांसारिक जीवन की मनोकामना पूरी होती है।
ऐसे में यदि नवरात्रि के दिनों में आने वाले बुधवार को उनका मंत्र जपें तो सभी समस्याएं कुछ ही क्षणों में दूर हो जाती हैं। आज के भागदौड़ भरे जीवन या फिर महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कवायद में कई धार्मिक आस्था रखने वाले लोग देव स्मरण चाहकर भी नहीं कर पाते। इसलिए यहां बताया जा रहा है श्रीगणेश पूजा का चंद मिनटों का उपाय, जिसे खासतौर पर जल्द सुख-सफलता की आस रखने वाले ऎसे लोग समय की कमी होने पर भी अपना सकते हैं।
कैसे करें नवरात्रों में गणेशजी की पूजा
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विघ्नहर्ता गणेश पूजा का यह उपाय जीवन में आने वाली अनचाही परेशानियों से बचाने वाला भी माना गया है। भगवान श्रीगणेश की उपासना के लिए बुधवार का बहुत महत्व है। इसलिए जल्द और लगातार सफलता के लिए भगवान गणेशजी का स्मरण करें। सुबह स्नान के बाद देवालय या भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा या फिर तस्वीर के सामने यह मंत्र बोल कर धूप या अगरबत्ती लगाएं -
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तम:। आघ्रेय सर्वदेवानां धूपो यं प्रतिगृह्यताम।।
धूप या अगरबत्ती से आरती कर व लड्डू का भोग लगा इस मंत्र से गणेशजी का ध्यान कर लें
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अभीप्सितार्थसिद्धयथंü पूजितो य: सुरासुरै:। सर्वविघ्रहरस्तस्मै गणाधिपतये नमो नम:।।
इसके बाद भगवान श्रीगणेश को प्रणाम कर दिन और काम बिन बाधा पूरा होने की कामना करें। यह उपाय आप कार्यस्थल पर भी पवित्रता का ध्यान रखते हुए अपना सकते हैं।
गणेश जी की उपासना का विशेष मंत्र
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यदि आप तांत्रिक मंत्रों का आश्रय नहीं लेना चाहते हैं तो इसके लिए वेदो में एक मन्त्र भी बताया गया है।
ऊं गणानां त्वा गणपति(गुँ) हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति(गुँ) हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति(गुँ)हवामहे व्वसो मम।
बुधवार को सुबह या शाम के वक्त इस मंत्र का ध्यान गणेश जी को सिंदूर, अक्षत, दूर्वा चढ़ाकर व यथाशक्ति लड्डूओं का भोग लगाकर कार्यसिद्धि की कामनाओं के साथ करें व धूप व दीप आरती करें। इस मन्त्र में भगवान गणेश जी और ऋद्धि-सिद्धि का स्मरण है, जिससे जीवन में अपार सुख-समृद्धि आती है।

बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

आपकी राशि और उपासना

आपकी राशि और दश महाविद्या
राशि देवी मंत्र जाप
मेष तारा ॐश्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट
वृष षोडशी ॐ ह्रीं क ए ई ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं
मिथुन भुवनेश्वरी ॐ ऐं ह्रीं श्रीं
कर्क कमला ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसौ: जगत्प्रसूत्यैनम:
सिंह बगलामुखी ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं नाशय ह्रीं ॐ स्वाहा
कन्या भुवनेश्वरी ॐ ऐं ह्रीं श्रीं
तुला षोडशी ॐ ह्रीं क ए ई ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं
वृश्चिक तारा ॐश्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट
धनु कमला ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसौ: जगत्प्रसूत्यैनम:
मकर काली ॐ क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा
कुंभ काली ॐ क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा
मीन कमला ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसौ: जगत्प्रसूत्यैनम:


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आपकी राशि और उपासना
राशि देवी मंत्र जाप
मेष माँ चंद्रघंटा देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम:
वृष माँ कात्यायनी देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कात्यायनी देव्यै नम:
मिथुन माँ कूष्माण्डा देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कुष्माण्डा देव्यै नम:
कर्क माँ ब्रह्मचारिणी देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ ब्रह्मचारिणी देव्यै नम:
सिंह माँ शैलपुत्री देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ ब्रह्मचारिणी देव्यै नम:
कन्या माँ कूष्माण्डा देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कुष्माण्डा देव्यै नम:
तुला माँ कात्यायनी देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कात्यायनी देव्यै नम:
वृश्चिक माँ चंद्रघंटा देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम:
धनु माँ स्कंद माता देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ स्कंदमाता देव्यै नम:
मकर माँ कालरात्रि देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कालरात्रि देव्यै नम:
कुंभ माँ कालरात्रि देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कालरात्रि देव्यै नम:
मीन माँ स्कंद माता देवी ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ स्कंदमाता देव्यै नम:

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देवी भागवत
(स्कंध 11, अध्याय 12) में लिखा है
कि विभिन्न प्रकार के रसों से देवी दुर्गा का अभिषेक किया जाए तो माता अति प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। आज हम आपको बता रहे हैं किस रस से देवी का अभिषेक किया जाए तो उसका क्या फल प्राप्त होता है-
- देवी भागवत के अनुसार वेद पाठ के साथ यदि कर्पूर, अगरु (सुगंधित वनस्पति), केसर, कस्तूरी व कमल के जल से देवी दुर्गा को स्नान करवाया जाए तो सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाता है तथा साधक को थोड़े प्रयासों से ही सफलता मिलती है। ये उपाय बहुत ही चमत्कारी है।
- देवी भागवत के अनुसार यदि माता दुर्गा को दूध से स्नान करवाया जाए तो व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-समृद्धि का स्वामी बनता है।
- माता जगदंबिका को गन्ने के रस से स्नान करवाया जाए तो लक्ष्मी और सरस्वती ऐसे भक्त का घर छोड़कर कभी नहीं जातीं। वहां नित्य ही संपत्ति और विद्या का वास रहता है।

दस महाविद्या साधना नवरात्री में

प्रथम दिन की महा देवी काली स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए
इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा:
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
दस महाविद्या की साधना करनेवाले सभी साधको को ९ दिन फलहार में रहना चाहिए तथा किसी एक रंग के वस्त्र को नौ दिन धारण करना चाहिए। रंगों में तीन रंग प्रमुख हैं- काला (उत्तम ), लाल (मध्य ), सफ़ेद (निम्न)। इस प्रकार का साधना विशेष साधको के लिए है। परन्तु सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस म़हामंत्र का जाप 108 बार करें तो उनके घरमें सुख शान्ति बनी रहती है और आकाल मृत्यु नही होती है.
द्वितीय दिन: माँ तारा की साधना.


दूसरे दिन की महा देवी माँ तारा स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को ईशान कोने की ओर मुख करके करनी चाहिए। ईशान कोन उत्तर पूर्व दिशा के बीच के कोन को कहते हैं.
इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं तारा ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके पुत्र के कष्टों का नाश होता है. अथवा अगर पुत्रहीन स्त्रियाँ यह जाप करें तो उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र के जाप से दुश्मनों पर विजय की प्राप्ति भी होती है.


तीसरा दिन: माँ भुवनेश्वरी
तीसरे दिन की महा देवी माँ भुवनेश्वरी स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को पूरब की ओर मुख करके करनी चाहिए।
इनका महा मंत्र क्रीं ह्रीं भुवनेश्वरी ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम १०८ -१०८ बार इस मंत्र का जाप करें तो भुवन के सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ उसे प्राप्त होती हैं तथा दरिद्र व्यक्तियों का इनकी आराधना करना सबसे उचित माना गया है.


चौथा दिन- माँ षोडशी
चौथा दिन की महा देवी माँ षोडशी स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को अग्नि कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। अग्नि कोन पूर्व दक्षिण दिशा के बीच के कोन को कहते हैं।-क्रीं ह्रीं षोडशी ह्रीं क्रीं स्वाहा: इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनका यौवन बना रहता है तथा उस व्यक्ति मैं आकर्षण की शक्ति बढती है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उन्हें कार्तिक के सामान वीर पुत्र की प्राप्ति होती है।


पांचवा दिन: माँ छिन्मस्तिका काली
पांचवा दिन की महा देवी माँ छिन्मस्तिका काली स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को दक्षिण कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं छिन्मस्तिका ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा उस व्यक्ति के तमो गुन और रजो गुन का भी नाश होता है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उनके काम वासना को नियंत्रित करता है.


छठा दिन: माँ भैरवी
छठे दिन की महा देवी माँ भैरवी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को नैरित कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए।नैरित कोण दक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं भैरवी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा अकाल मृत्यु , दुष्टात्मा के प्रभाव से बचाव होता है


सातवाँ दिन: माँ धूमावती
सातवें दिन की महा देवी माँ धूमावती स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पश्चिम कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं धूमावती ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके घर से रोग, कलह, दरिद्रता का नाश होता है.


आठवां दिन: माँ बंगलामुखी
आठवे दिन की महा देवी माँ बंगलामुखी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को भंडार कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। भंडार कोण पश्चिम और उत्तर दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं बंगलामुखी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ बंगलामुखी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके ऊपर किसी तांत्रिक क्रिया को कराया जा रहा हो और जिस से वो परेशान हो। इस मंत्र का जाप करने से वैसे दुष्ट व्यक्तियों का नाश होता है। इनका जाप करते समय साधक को पीला वस्त्र धारण करना चाहिए और पीले माला से जाप करना चाहिए। उस माला को जाप ख़त्म होने के बाद किसी पीपल के पेड़ पर टांग देना चाहिए.


नौवां दिन: माँ मातंगी
नौवे दिन की महा देवी माँ मातंगी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पृथ्वी की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ मातंगी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके जीवन में माता के प्रेम की कमी हो अथवा उनकी माता को कोई कष्ट हो। जो किसान आकाल या बाढ़ से पीड़ित होते है वे भी माँ मातंगी का अगर सामूहिक रूप से जाप करे तो अकाल या बढ़ का प्रभाव कम होता है.


दसवां दिन: माँ कमला
दसवें दिन की महा देवी माँ कमला स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को आकाश की ओर मुख करके करनी चाहिए।इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं कमला ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ कमला का जाप दसो महाविद्या में सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। इनका जाप करने वाले जीवन में कभी भी दरिद्र नही होते। शास्त्रों में कहा गया है की जो माँ कमला की साधना करते हैं उन्हे सभी प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं।

नवरात्र में भगवती को लगाए जाने वाले भोग

नवरात्र में भगवती को लगाए जाने वाले भोग
नवरात्र का पहला दिन माँ शैलपुत्री का- इस दिन भगवती जगदम्बा की गोघृत से पूजा होनी चाहिये अर्थात् षोडशोपचार से पूजन करके नैवेद्य के रूप में उन्हें गाय का घृत अर्पण करना चाहिये एवं फिर वह घृत ब्राह्मण को दे देना चाहिये। इसके फलस्वरूप मनुष्य कभी रोगी नहीं हो सकता।
नवरात्र का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी का- इस दिन पूजन करके भगवती जगदम्बा को चीनी का भोग लगावे और ब्राह्मण को दे दें। यों करने से मनुष्य दीर्घायु होता है।
नवरात्र का तीसरा दिन माँ चंद्रघण्टा का- भगवती की पूजा में दूध की प्रधानता होती चाहिये एवं पूजन के उपरान्त वह दूध किसी ब्राह्मण को दे देना उचित है। यह सम्पूर्ण दु:खों से मुक्त होने का एक परम साधन है।
नवरात्र का चौथा दिन माँ कूष्माण्डा का- इस दिन मालपूआ का नैवेद्य अर्पण किया जाय और फिर वह योग्य ब्राह्मण को दे दिया जाय। इस अपूर्व दानमात्र से ही किसी प्रकार के विघ् सामने नहीं आ सकते।
नवरात्र का पांचवां दिन माँ स्कंदमाता का- इस दिन पूजा करके भगवती क ो केले का भोग लगाये और वह प्रसाद ब्राह्मण को दे दें, ऐसा करने से पुरुष की बुद्धि का विकास होता है।
नवरात्र का छठा दिन माँ कात्यायनी का- इस दिन देवी के पूजन में मधु का महत्त्व बताया गया है। वह मधु ब्राह्मण अपने उपयोग में ले। इसके प्रभाव से साधक सुन्दर रूप प्राप्त करता है।
नवरात्र का सातवां दिन माँ कालरात्रि का- इस दिन भगवती की पूजा में गुड़ का नैवेद्य अर्पण करके ब्राह्मण को दे देना चाहिये। ऐसा करने से पुरुष शोकमुक्त हो सकता है।
नवरात्र का आठवां दिन माँ महागौरी का- इस दिन भगवती को नारियल का भोग लगाना चाहिये। फिर नैवेद्य रूप वह नारियल ब्राह्मण को दे देना चाहिये। इसके फलस्वरूप उस पुरुष के पास किसी प्रकार के संताप नहीं आ सकते।
नवरात्र का नौवां दिन माँ सिध्दिदात्री का- इस दिन भगवती को धान का लावा अर्पण करके ब्राह्मण को दे देना चाहिये। इस दान के प्रभाव से पुरुष इस लोक और परलोक में भी सुखी रह सकता है।

नव दुर्गा साधना

मन्त्र जप बिना योग्य निर्देशन न करे..
नव दुर्गा साधना :--

1 शैलपुत्री जो त्रैलोक्य मोहन कार्य अर्थात तीनो लोको को मोहित कर देने वाली शक्ति है ..
मंत्र ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वजन मनोहारिणी नमः स्वाहा

2 ब्रह्मचारिणी जो समस्त इच्छाओ को पूरण करने वाली शक्ति है ..
मंत्र ऐं क्लीं सौः कामेश्वरीच्छा काम फल प्रदे देवी नमः स्वाहा

3 चन्द्रघंटा जो समस्त प्रकार की पापो का हनन करने वाली शक्ति है ..
मंत्र श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं सर्वपापसंहारिके देवी नमः स्वाहा

4 कुष्मांडा जो सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली शक्ति है ..
मंत्र ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सर्व सौभाग्य प्रदायिनी देवी नमः स्वाहा

5 स्कन्दमाता जो समस्त प्रकार की कार्य को सिद्धि करने वाली शक्ति है चाहे वो शांति कर्म हो या मारण कर्म..
मंत्र ऐं ईं हौं सः कामत्रिपुराय नमः स्वाहा

6 कात्यानी जो सर्व प्रकार की रक्षा करने वाली शक्ति है ..
मंत्र ॐ ह्रीं महायक्षीश्वरी रक्षय रक्षय मम शत्रुनाम भक्षय भक्षय स्वाहा

7काल रात्रि जो समस्त प्रकार की रोग नाश करने वाली शक्ति है ..
मंत्र ॐ कालि कालि काल रात्रिके मम सर्व रोगान छिन्धि छिन्धि भिन्दी भिन्दी भक्षय भक्षय नमः स्वाहा

8 महागौरी जो समस्त प्रकार की आनंद को देने वाली शक्ति है..
मंत्र ह्रीं क्लीं ॐ सर्व आनंद प्रदायिने नित्य मदद्रवे स्वाहा

9 सिद्धिदात्री जो समस्त प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाली है ..
मंत्र स्त्रीं हूँ फट क्लीं ऐं तुरे तारे कुल्ले कुरु कुल्ले नमः स्वाहा




इन शक्तिओ की मंत्र साधना आप नव रात्र के दौरान कर सकते है ..
विधान व सामग्री ..............
लाल वस्त्र आसनी ..दिशा उत्तर .. माला रुद्राक्ष की या लाल चन्दन की गले में रुद्राक्ष होना अनिर्वार्य है ..
माँ दुर्गा के चित्र के सामने नौ दीपक शुद्ध घी के प्रज्वलित कर उन दीपकों को नव दुर्गा स्वरुप मान कर नौ दिन लगातार इन्ही दीपकों को प्रज्वलित करे और गुरु पूजन आज्ञा लेकर बिना संकल्प लिए यह साधना करना होता है ...दीपक बदलना नहीं बस बत्ती छोटा हो जाय तो उसे बदल दीजियेगा

इन 9 औषधियों में विराजती है नवदुर्गा
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां, जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है।
नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है।
ऐसा माना जाता है कि यह औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है।
आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी..

1 प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ -नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है।
इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।
पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा कल्याण करने वाली।

2 द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी -ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है।
यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।

तृतीयं चंद्रघण्टेति
कुष्माण्डेती चतुर्थकम

3 तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर-नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।
यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

4 चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा -नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।

पंचम स्कन्दमातेति
षष्ठमं कात्यायनीति च

5 पंचम स्कंदमाता यानि अलसी -नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।
अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।

6 षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया -नवदुर्गा काछठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।

सप्तमं कालरात्री
ति महागौरीति चाष्टम

7 सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन-दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वालीऔषधि है।
इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

8 अष्टम महागौरी यानि तुलसी -नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।
तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

नवमं सिद्धिदात्री च
नवदुर्गा प्रकीर्तिता

9 नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी -नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य कोस्वस्थ करती है।
अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

विशेष पूजन प्रकार

विशेष पूजन प्रकार
प्रतिपदा से ही पूजक पुरोहित, आचार्य, ब्रह्मा एवं पार्ठकत्ताओं का सविधि वरण किया जाता है। सबके सब नियम पूर्वक अपना कार्य करते हैं। षष्ठी तिथि को बिल्व फल पूजन के लिए पूर्व से ही निर्धारित बिल्व वृक्ष का चयन किया जाता है। बिल्व फल एक ही डाल में जोड़े (दो) होने चाहिए। षष्ठी के सांयकाल गाजे-बाजे व समारोह के साथ बिल्व वृक्ष के नीचे जाकर वृक्ष पूजन और फल पूजन किया जाता है। फलों को पीले वस्त्र में पुष्प, अक्षत, हल्दी की गांठ, साबूत धनिया आदि रखकर बाँध दिया जाता है और उसे निमंत्रण दे दिया जाता है। षष्ठी के दिन ही सरस्वती का आवाहन किया जाता है। लेख है-
मूलेन आवाहयेद्देवी श्रवणेन विसर्जयेत्
षष्ठी तिथि और मूल नक्षत्र में सरस्वती का आवाहन और श्रवण नक्षत्र दशमी तिथि में भगवती का विसर्जन किया जाता है।
सप्तमी तिथि को प्रात: काल ही समारोह के साथ बिल्व वृक्ष के पास जाकर वृक्ष और फलों का पूजन किया जाता है। बिल्व वृक्ष रूप लक्ष्मी से प्रार्थना कर फल काट लेते हैं। ध्यान रहे, फल काटते समय डण्ठल एक ही बार में कट जाय। उसके बाद फलों को किसी विशेष सवारी पर लाकर पूजन स्थल (मन्दिर) के दरवाजे के सामने बाहर में ही स्थान को पवित्र कर चावल से अष्टदल कमल बनाकर उस पर रखकर विधान पूर्वक पूजन करें। पूजन के साथ ही बलिदान का भी विधान है। आस पास के रहने वाले भूत-प्रेतों के लिए भी बलिदान दिया जाता है। पुन: मन्दिर का द्वार पूजन व द्वार देवताओं के लिए बलिदान देकर स्वस्ति वाचन के साथ फल लेकर प्रवेश करें।
बिल्व फल को पूर्व स्थापित सर्वतोभद्रमंडल पर कलश के बगल में रखें। बिल्व फल के साथ ही नव प्रकार के वनस्पतियों के पत्ते यथा धान्य, जयंती, कचु, हल्दी, कदली, अशोक, अनार व मानक के पत्ते नवपत्रिकाओं पर क्रमश: कदली (केले), षट (ब्रह्माणी), अनार-रक्तदंतिका, धान्य-लक्ष्मी, हरिद्रा-दुर्गा, मानक-चामुण्डा, कचुपत्र-कालिका, बिल्वपत्र-शिवा, अशोक-शोक रहिता और जयंती-कातिँकी देवियों का पूजन करना चाहिए। बिल्व फल पर भगवती का आवाहन कर पूजन किया जाता है। इस पूजन के बाद स्थापित मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा कर पूजन किया जाता है। इसी दिन से नवमी पर्यन्त भगवती की मूर्ति के साथ ही अन्य मूर्तियों की पूजा होती है। मूर्तियों में गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, शिव, पार्वती आदि की मूर्तियां भी रहती है। सबों का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। साथ ही पूर्ववत् पाठादि कार्यक्रम चलते रहते हैं। सप्तमी तिथि से दशमी पर्यन्त महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के नाम से पूजन करना चाहिये।
अष्टमी को पूर्ववत् पूजन पाठ आदि होते हैं। मध्य रात्रि में अष्टमी तिथि रहते हुए निशापूजा का विधान है। यदि अष्टमी के मध्य रात्रि में अष्टमी तिथि नहीं हो तो सप्तमी की ही अष्टमी युक्त मध्य रात्रि में निशापूजा करनी चाहिए। निशा पूजा में विशेषकर योगिनियों की पूजा के साथ अंग पूजन, वाहन, अस्त्र, शस्त्रादि का पूजन किया जाता है।
पूजन के उपरान्त सब देवताओं के लिए बलि भी दी जाती है। बलि से अभिप्राय अपितु कुष्माण्ड, नारियल, नीबू एवं चावल, उड़द, दही का मिश्रित बलि सब देवताओं के लिए दी जाती है और सर्वमान्य हैं। और यदि संभव हो तो 101 घी का दीपक जलाकर भगवती को उत्सर्ग करें। इसी निशा पूजा के समय शिवाबलि का विधान है। यह एक आवश्यक विधान माना गया है। यदि संभव हो तो चावल (भात), सब्जी, दही आदि के साथ शिवा (सियाल) के मांद के सामने रख दें। यों तो विधान हैं कि सायंकाल ही जाकर उसके मांद के पास एक सुपारी या पुष्प रखकर निमंत्रण दे दें और अर्धरात्रि में उक्त सामान भोजन के लिए जगह लीप कर रखें। साथ ही पूजन भी कर दें। इस विधान से नवरात्र पूजन की सफलता व असफलता का भी अनुमान लगाया जाता है। प्रात: काल देखें कि यदि उसने सारा भोजन कर लिया है या नहीं, यदि उसने नहीं खाया तो पूजन की सफलता में लोग त्रुटि का अनुमान लगाते हैं।
नवमी तिथि को पूर्ववत् पूजन पाठ आदि कार्यक्रम होते हैं। नवमी को ही पाठादि कार्यक्रम पूर्ण कर लिया जाता है। सायं अथवा रात्रि में नवरात्र की पूर्णाहुति रूप हवन किया जाता है। कहीं कहीं नवमी के दिन में ही हवन करते हैं। इसमें कोई विरोध नहीं हैं। यहां तक भी देखा जाता है कि घर में अथवा मंदिरों में जहां मूर्ति की स्थापना नहीं होती अष्टमी की रात्रि में भी हवन करते हैं। यह भी विधान से बाहर की बात नहीं है किंतु संकल्पित पाठ पूर्ण होने पर ही हवन का विधान हैं।