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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

भगवती के आगमन व गमन का फल

भगवती के आगमन व गमन का फल
नवरात्र के प्रथम दिन भगवती का आगमन और दशमी को गमन दिनों के अनुसार वर्ष का शुभ और अशुभ का ज्ञान करते हैं यथा-

भगवती का आगमन दिन


शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे।
गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥

रविवार और सोमवार को भगवती हाथी पर आती हैं, शनि और मंगल वार को घोड़े पर, बृहस्पति और शुक्रवार को डोला पर, बुधवार को नाव पर आती हैं।
 
गजेश जलदा देवी क्षत्रभंग तुरंगमे।
नौकायां कार्यसिद्धिस्यात् दोलायों मरणधु्रवम्॥

अर्थात् दुर्गा हाथी पर आने से अच्छी वर्षा होती है, घोड़े पर आने से राजाओं में युद्ध होता है। नाव पर आने से सब कार्यों में सिद्ध मिलती है और यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।


गमन (जाने)विचार:-

शशि सूर्य दिने यदि सा विजया
महिषागमने रुज शोककरा,
शनि भौमदिने यदि सा विजया
चरणायुध यानि करी विकला।
बुधशुक्र दिने यदि सा विजया
गजवाहन गा शुभ वृष्टिकरा,
सुरराजगुरौ यदि सा विजया
नरवाहन गा शुभ सौख्य करा॥
 
भगवती रविवार और सोमवार को महिषा (भैंसा)की सवारी से आती है जिससे देश में रोग और शोक की वृद्धि होती है। शनि और मंगल को पैदल आती हैं जिससे विकलता की वृद्धि होती है। बुध और शुक्र दिन में भगवती हाथी पर आती हैं। इससे वृष्टि वृद्धि होती है। बृहस्पति वार को भगवती मनुष्य की सवारी से आती हैं। जो सुख और सौख्य की वृद्धि करती है।

इस प्रकार भगवती का आना जाना शुभ और अशुभ फल सूचक हैं। इस फल का प्रभाव यजमान पर ही नहीं, पूरे राष्ट्र पर पड़ता हैं।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

आरती उतारने का विधान

कई बार हम सब लोग जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारते रहते हैं जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान होता है -चार बार चरणों में दो बार नाभि पर एक बार मुख पर सात बार पूरे शरीर पर इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है - जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात १,३,५,७ बत्तियॉं बनाकर ही आरती की जानी चाहिये.

किस मातृका शक्ति कि साधना करने से क्या प्राप्त होता है आइये अब इस पर एक निगाह डालते हैं :-

शैलपुत्री साधना- भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छा पूर्ति।
ब्रहा्रचारिणी साधना- विजय एवं आरोग्य की प्राप्ति।
चंद्रघण्टा साधना- पाप-ताप व बाधाओं से मुक्ति हेतु।
कूष्माण्डा साधना- आयु, यश, बल व ऐश्वर्य की प्राप्ति।
स्कंद साधना- कुंठा, कलह एवं द्वेष से मुक्ति।
कात्यायनी साधना- धर्म, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति तथा भय नाशक।
कालरात्रि साधना- व्यापार/रोजगार/सर्विस संबधी इच्छा पूर्ति।
महागौरी साधना- मनपसंद जीवन साथी व शीघ्र विवाह के लिए।
सिद्धिदात्री साधना- समस्त साधनाओं में सिद्ध व मनोरथ पूर्ति।

किसी भी देवता की प्रसन्नता के लिए हमें उस देवता का मंत्र व नाम सहित क्रम से पूजन व श्रृंगार क़रना चाहिये

किसी भी देवता की प्रसन्नता के लिए हमें उस देवता का मंत्र व नाम सहित क्रम से पूजन व श्रृंगार क़रना चाहिये।
षोडशोपचार पूजन :
१.आवाहन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आगच्छय आगच्छय
२. आसन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आसनं समर्पयामि
३. पाद्य ( चरण धोना ) - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पाद्यं निवेदयामि
४. अर्घ्य - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे अर्घ्यं निवेदयामि
५, आचमन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
६. स्नान - ॐ सह त्रिवेणी सलिलाधारम लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे स्नानं निवेदयामि
७. वस्त्र - वस्त्र समर्पण में हमेशा दो वस्त्रों का समर्पण किया जाता है और उसका रंग लाल होना चाहिए - वस्त्र न होने कि स्थिति में मौली धागा ( जो प्रायः अनुष्ठान में रक्षा धागा के रूप में पुरोहितों द्वारा यजमान के हाथ में बंधा जाता है प्रयोग किया जा सकता है किन्तु उनमे से किसी भी धागे कि लम्बाई बारह अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए )अ. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे प्रथम वस्त्रं समर्पयामिब. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि
८. यज्ञोपवीत ( यज्ञोपवीत एक धागा होता है जो गृहस्थ लोगों द्वारा धारण किया जाता है ) - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे यज्ञोपवीतं समर्पयामि
९. चन्दन - ॐ मल्यांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं - शीतलं बहुलामोदम गन्धं चन्दनं निवेदयामि
१०. अक्षत - ( अक्षत को हिंदी में चावल बोलते हैं अक्षत का पूजा एवं साधना में अभिप्राय होता है - आपके इष्ट के पसंदीदा रंग में रंगे हुए चावल जो टूटे-फूटे हुए न हों - माँ चामुंडा कि साधना में अक्षत लाल रंग में रंगे हुए प्रयोग किये जाते हैं - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
११. पुष्प - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुष्पं समर्पयामि
१२. सिंदूर ( सिंदूर समर्पण करते समय एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब भी आप सिंदूर चढ़ाएंगे तो सिंदूर को माँ के मस्तक या ऊपर नहीं चढ़ाना है बल्कि उस सिन्दूर को उनके चरणों के पास समर्पित करना है ) - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे सिन्दूरं समर्पयामि
१३. पान - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे ताम्बूलं समर्पयामि
१४. सुपारी - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुन्गीफलं समर्पयामि
१५. धूप - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे गुग्गल संयुतं नाना गंध समन्वितं एवं भक्ष्य पदार्थ समन्वितं धूपं समर्पयामि
१६ . दीप - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे घृत-कर्पूर-कपास एव स्वर्ण पात्र निर्मित दीपं समर्पयामि
१७ . नैवेद्य - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे नाना फल फूल एव खाद्य पदार्थ संयुक्त नैवेद्यम समर्पयामि-मध्यम पूजन खंड इन उपरोक्त
१७ चरणों को प्राथमिक पूजन में शामिल किया जाता है