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बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

दस महाविद्या साधना नवरात्री में

प्रथम दिन की महा देवी काली स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए
इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा:
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
दस महाविद्या की साधना करनेवाले सभी साधको को ९ दिन फलहार में रहना चाहिए तथा किसी एक रंग के वस्त्र को नौ दिन धारण करना चाहिए। रंगों में तीन रंग प्रमुख हैं- काला (उत्तम ), लाल (मध्य ), सफ़ेद (निम्न)। इस प्रकार का साधना विशेष साधको के लिए है। परन्तु सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस म़हामंत्र का जाप 108 बार करें तो उनके घरमें सुख शान्ति बनी रहती है और आकाल मृत्यु नही होती है.
द्वितीय दिन: माँ तारा की साधना.


दूसरे दिन की महा देवी माँ तारा स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को ईशान कोने की ओर मुख करके करनी चाहिए। ईशान कोन उत्तर पूर्व दिशा के बीच के कोन को कहते हैं.
इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं तारा ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके पुत्र के कष्टों का नाश होता है. अथवा अगर पुत्रहीन स्त्रियाँ यह जाप करें तो उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र के जाप से दुश्मनों पर विजय की प्राप्ति भी होती है.


तीसरा दिन: माँ भुवनेश्वरी
तीसरे दिन की महा देवी माँ भुवनेश्वरी स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को पूरब की ओर मुख करके करनी चाहिए।
इनका महा मंत्र क्रीं ह्रीं भुवनेश्वरी ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम १०८ -१०८ बार इस मंत्र का जाप करें तो भुवन के सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ उसे प्राप्त होती हैं तथा दरिद्र व्यक्तियों का इनकी आराधना करना सबसे उचित माना गया है.


चौथा दिन- माँ षोडशी
चौथा दिन की महा देवी माँ षोडशी स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को अग्नि कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। अग्नि कोन पूर्व दक्षिण दिशा के बीच के कोन को कहते हैं।-क्रीं ह्रीं षोडशी ह्रीं क्रीं स्वाहा: इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनका यौवन बना रहता है तथा उस व्यक्ति मैं आकर्षण की शक्ति बढती है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उन्हें कार्तिक के सामान वीर पुत्र की प्राप्ति होती है।


पांचवा दिन: माँ छिन्मस्तिका काली
पांचवा दिन की महा देवी माँ छिन्मस्तिका काली स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को दक्षिण कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं छिन्मस्तिका ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा उस व्यक्ति के तमो गुन और रजो गुन का भी नाश होता है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उनके काम वासना को नियंत्रित करता है.


छठा दिन: माँ भैरवी
छठे दिन की महा देवी माँ भैरवी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को नैरित कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए।नैरित कोण दक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं भैरवी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा अकाल मृत्यु , दुष्टात्मा के प्रभाव से बचाव होता है


सातवाँ दिन: माँ धूमावती
सातवें दिन की महा देवी माँ धूमावती स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पश्चिम कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं धूमावती ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके घर से रोग, कलह, दरिद्रता का नाश होता है.


आठवां दिन: माँ बंगलामुखी
आठवे दिन की महा देवी माँ बंगलामुखी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को भंडार कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। भंडार कोण पश्चिम और उत्तर दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं बंगलामुखी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ बंगलामुखी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके ऊपर किसी तांत्रिक क्रिया को कराया जा रहा हो और जिस से वो परेशान हो। इस मंत्र का जाप करने से वैसे दुष्ट व्यक्तियों का नाश होता है। इनका जाप करते समय साधक को पीला वस्त्र धारण करना चाहिए और पीले माला से जाप करना चाहिए। उस माला को जाप ख़त्म होने के बाद किसी पीपल के पेड़ पर टांग देना चाहिए.


नौवां दिन: माँ मातंगी
नौवे दिन की महा देवी माँ मातंगी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पृथ्वी की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ मातंगी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके जीवन में माता के प्रेम की कमी हो अथवा उनकी माता को कोई कष्ट हो। जो किसान आकाल या बाढ़ से पीड़ित होते है वे भी माँ मातंगी का अगर सामूहिक रूप से जाप करे तो अकाल या बढ़ का प्रभाव कम होता है.


दसवां दिन: माँ कमला
दसवें दिन की महा देवी माँ कमला स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को आकाश की ओर मुख करके करनी चाहिए।इनका महा मंत्र – क्रीं ह्रीं कमला ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ कमला का जाप दसो महाविद्या में सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। इनका जाप करने वाले जीवन में कभी भी दरिद्र नही होते। शास्त्रों में कहा गया है की जो माँ कमला की साधना करते हैं उन्हे सभी प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

आरती उतारने का विधान

कई बार हम सब लोग जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारते रहते हैं जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान होता है -चार बार चरणों में दो बार नाभि पर एक बार मुख पर सात बार पूरे शरीर पर इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है - जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात १,३,५,७ बत्तियॉं बनाकर ही आरती की जानी चाहिये.

किस मातृका शक्ति कि साधना करने से क्या प्राप्त होता है आइये अब इस पर एक निगाह डालते हैं :-

शैलपुत्री साधना- भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छा पूर्ति।
ब्रहा्रचारिणी साधना- विजय एवं आरोग्य की प्राप्ति।
चंद्रघण्टा साधना- पाप-ताप व बाधाओं से मुक्ति हेतु।
कूष्माण्डा साधना- आयु, यश, बल व ऐश्वर्य की प्राप्ति।
स्कंद साधना- कुंठा, कलह एवं द्वेष से मुक्ति।
कात्यायनी साधना- धर्म, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति तथा भय नाशक।
कालरात्रि साधना- व्यापार/रोजगार/सर्विस संबधी इच्छा पूर्ति।
महागौरी साधना- मनपसंद जीवन साथी व शीघ्र विवाह के लिए।
सिद्धिदात्री साधना- समस्त साधनाओं में सिद्ध व मनोरथ पूर्ति।

किसी भी देवता की प्रसन्नता के लिए हमें उस देवता का मंत्र व नाम सहित क्रम से पूजन व श्रृंगार क़रना चाहिये

किसी भी देवता की प्रसन्नता के लिए हमें उस देवता का मंत्र व नाम सहित क्रम से पूजन व श्रृंगार क़रना चाहिये।
षोडशोपचार पूजन :
१.आवाहन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आगच्छय आगच्छय
२. आसन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आसनं समर्पयामि
३. पाद्य ( चरण धोना ) - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पाद्यं निवेदयामि
४. अर्घ्य - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे अर्घ्यं निवेदयामि
५, आचमन - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
६. स्नान - ॐ सह त्रिवेणी सलिलाधारम लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे स्नानं निवेदयामि
७. वस्त्र - वस्त्र समर्पण में हमेशा दो वस्त्रों का समर्पण किया जाता है और उसका रंग लाल होना चाहिए - वस्त्र न होने कि स्थिति में मौली धागा ( जो प्रायः अनुष्ठान में रक्षा धागा के रूप में पुरोहितों द्वारा यजमान के हाथ में बंधा जाता है प्रयोग किया जा सकता है किन्तु उनमे से किसी भी धागे कि लम्बाई बारह अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए )अ. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे प्रथम वस्त्रं समर्पयामिब. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि
८. यज्ञोपवीत ( यज्ञोपवीत एक धागा होता है जो गृहस्थ लोगों द्वारा धारण किया जाता है ) - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे यज्ञोपवीतं समर्पयामि
९. चन्दन - ॐ मल्यांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं - शीतलं बहुलामोदम गन्धं चन्दनं निवेदयामि
१०. अक्षत - ( अक्षत को हिंदी में चावल बोलते हैं अक्षत का पूजा एवं साधना में अभिप्राय होता है - आपके इष्ट के पसंदीदा रंग में रंगे हुए चावल जो टूटे-फूटे हुए न हों - माँ चामुंडा कि साधना में अक्षत लाल रंग में रंगे हुए प्रयोग किये जाते हैं - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
११. पुष्प - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुष्पं समर्पयामि
१२. सिंदूर ( सिंदूर समर्पण करते समय एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब भी आप सिंदूर चढ़ाएंगे तो सिंदूर को माँ के मस्तक या ऊपर नहीं चढ़ाना है बल्कि उस सिन्दूर को उनके चरणों के पास समर्पित करना है ) - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे सिन्दूरं समर्पयामि
१३. पान - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे ताम्बूलं समर्पयामि
१४. सुपारी - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुन्गीफलं समर्पयामि
१५. धूप - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे गुग्गल संयुतं नाना गंध समन्वितं एवं भक्ष्य पदार्थ समन्वितं धूपं समर्पयामि
१६ . दीप - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे घृत-कर्पूर-कपास एव स्वर्ण पात्र निर्मित दीपं समर्पयामि
१७ . नैवेद्य - ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे नाना फल फूल एव खाद्य पदार्थ संयुक्त नैवेद्यम समर्पयामि-मध्यम पूजन खंड इन उपरोक्त
१७ चरणों को प्राथमिक पूजन में शामिल किया जाता है

भय को नष्ट करने वाले देवता का नाम है भैरव

भय को नष्ट करने वाले देवता का नाम है भैरव

भैरव के होते है आठ प्रमुख रूप, किसी भी रूप की साधना बना सकती है महाबलशाली, भैरव की सौम्य रूप में करनी चाहिए साधना पूजा, कुत्ता भैरव जी का वाहन है, कुत्तों को भोजन अवश्य खिलाना चाहिए, पूरे परिवार की रक्षा करते हैं भैरव देवता, काले वस्त्र और नारियल चढाने से होते हैं प्रसन्न, भैरव के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता, जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के लिए भैरव को चौमुखा दीपक जला कर चढ़ाएं, भैरव की मूर्ती पर तिल चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, भैरव के मन्त्रों से होता है सारे दुखों का नाश..

भय नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय भयं हन

उरद की दाल भैरव जी को अर्पित करें
पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें
दक्षिण दिशा की और मुख रखें

शत्रु नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय शत्रु नाशं कुरु
नारियल काले वस्त्र में लपेट कर भैरव जी को अर्पित करें
गुगुल की धूनी जलाएं
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें
पश्चिम कि और मुख रखें

जादू टोना नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय तंत्र बाधाम नाशय नाशय
आटे के तीन दिये जलाएं
कपूर से आरती करें
रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें
दक्षिण की और मुख रखे

प्रतियोगिता इंटरवियु में सफलता का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय साफल्यं देहि देहि स्वाहा:
बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं
एक अखंड दीपक जला कर रखें
रुद्राक्ष की मलका से 8 माला का मंत्र जप करें
पूर्व की और मुख रखें

बच्चों की रक्षा का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय कुमारं रक्ष रक्ष
मीठी रोटी का भोग लगायें
दो नारियल भैरव जी को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें
पश्चिम की ओर मुख रखें

लम्बी आयु का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय रुरु स्वरूपाय स्वाहा:
काले कपडे का दान करें
गरीबों को भोजन खिलाये

बन जाएगा हर बिगड़ा काम इस मंत्र से

बन जाएगा हर बिगड़ा काम इस मंत्र से..
ऐसा कई बार होता है कि हमारा कोई काम बनते-बनते बिगड़ जाता है। ऐसे में हमें काफी निराशा होती है। कई बार ऐसा भी होता है कि हमारे कार्य की सफलता उन लोगों पर टिकी होती है जिनके हमारी बिल्कुल नहीं बनती। ऐसे समय अगर नीच लिखे मंत्र का विधि-विधान से जप किया जाए तो हर बिगड़ी हुई बात बन जाती है और कार्य सिद्धि हो जाता है।
मंत्र–
ओम् श्रीं श्रीं ओम् ओम् श्रीं श्रीं हुं फट् स्वाहा।
जप विधि.
सुबह जल्दी उठकर साफ वस्त्र पहनकर सबसे पहले भगवान शिव की पूजा करें। इसके बाद एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में इस मंत्र का असर दिखने लगेगा और आपके कार्य बन सकते है ऐसी सम्भावना बहुत ज्यादा है ।l

अशोक के पेड़ से करे शोक निवारण

मंत्र---- सुनहु बिनय मम् बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरू मम सोका।।
अशोक के पेड़ से करे
शोक निवारण
पीपल और बरगद के विषय में तो आप कई बार जान और पढ़ चुके होंगे, आज हम आपको अशोक का पेड़ इंसान के जीवन की परेशानियों को किस तरह हल कर सकता है या किस तरह उनके काम आ सकते है।
१. कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में धन की कमी जैसे हालातों का सामना नहीं करना चाहता। लेकिन अगर किसी कारणवश ऐसी स्थिति आ गई है तो अशोक के पेड़ की जड़ को आमंत्रण देकर या फिर दुकान लेकर आएं। इस जड़ को किसी पवित्र स्थान पर रखने से धन से जुड़ी समस्या का समाप्त हो जाएगी।
२. पति-पत्नी के बीच तनाव या फिर पारिवारिक कलह को शांत करने के लिए अशोक के 7 पत्तों को मंदिर में रख दें। मुरझाने के बाद इन पत्तों को हटाकर दूसरे नए पत्ते ले आएं और पुराने पत्तों को पीपल के पेड़ की जड़ में डाल दें। यह उपाय करने से पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है।
३. घर में कोई उत्सव या त्यौहार हो, या फिर कोई शुभ कार्य होना हो तो अशोक के पत्तों की वंदनवार बनाकर दहलीज के बाहर कुछ ऐसे लगाएं कि हर अंदर आने वाले व्यक्ति के सिर पर वे स्पर्श हों। इसके प्रभाव से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
४. तांबे की ताबीज में अशोक के बीज धारण करने से लगभग हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है। ना तो व्यक्ति को धन से जुड़ी कोई दिक्कत आती है और ना ही उसकी गरिमा कम होती है।
५. दुर्गा के भक्तों और उनकी कृपा पाने की लालसा रखने वाले व्यक्तियों को प्रतिदिन अशोक के पेड़ की जड़ में पानी चढ़ाना चाहिए। जल चढ़ाते समय देवी का जाप या उनका ध्यान अवश्य किया जाना चाहिए। इस उपाय को करने से बिगड़ती किसमत भी बन जाती है।
५. अगर कहीं से भी कोई समस्या हल नहीं हो रही हो तो अशोक के पेड़ के नीचे जाकर अपनी मनोकामना बोले और निम्न मंत्र का जाप करें, इसके बाद १ पत्ता तोड़ कर अपनी जेब में रख लें। ४१ दिन लगातार करने से सारी समस्याएं दुर होती है।
मंत्र---- सुनहु बिनय मम् बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरू मम सोका।।