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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

हमारी दिनचर्या कैसी हो ?

हमारी  दिनचर्या  कैसी  हो ?

प्रातः 5:00 – 6:00 बजे — जागरण , उषापान, नित्यकर्म स्नानादि |
प्रातः 6:00 – 7:00 बजे — योगासन, प्राणायाम , टहलना |
प्रातः 7:30 – 8:00 बजे — नाश्ता [ फल / अंकुरित अन्न / दूध |
प्रातः 11:30 - 12:00 बजे -- दोपहर का भोजन - हरी सब्जी + सलाद + चपाती + दाल |
सायं 4 :00 बजे -- जूस या फल |
सायं 6 :00 बजे -- सूप |
रात्रि 7 :00 बजे -- रात का भोजन - हरी सब्जी + चपाती या मिक्स वेजिटेबिल दलिया |
रात्रि 10 :00 बजे -- एक गिलास दूध [ यदि लेना चाहें ], शयन |



उपर्युक्त भोजनक्रम एक स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए है | यदि व्यक्ति किसी रोग से ग्रस्त है तो भोजनक्रम किसी आहार विशेषज्ञ के निर्देशानुसार रखें |

विशेष :
कम-से-कम ६-७ घंटे की नींद अवश्य लें |
दिन में भोजन के उपरांत विश्राम करें, दिन में सोना हितकर नही है |
पूर्ण आहार के मध्य ६-७ घंटे का अन्तराल अवश्य रखें |
भोजन के तुरंत पहले , साथ में या बाद में पानी नही पीना चाहिए | भोजन के एक घंटा पहले एवं दो घंटा बाद पानी पीना सर्वोत्तम है |
भोजन के प्रत्येक ग्रास को चबाते हुए शांत भाव से भोजन करना चाहिए |
फल खाते समय एक बार में एक तरह के फल का ही प्रयोग करें | कई तरह के फलों का एक साथ सेवन नही करना चाहिए |
भोजन में सब्जी व् सलाद की मात्रा अन्न से दोगुनी रहनी चाहिए |
स्वाद के लिए ठूंस – ठूंस कर नहीं खाना चहिये |
जूस,सूप आदि तरल पदार्थ धीरे-धीरे पीना चाहिए जिससे कि ‘ लार ‘ उसमें अच्छी तरह से मिल जाये |
भोजन के बाद चार घंटे तक पानी के अतिरिक्त अन्य कुछ नही लेना चाहिए |
पानी गर्मियों में २ से ३ लीटर व् सर्दियों में १ से २ लीटर कम से कम लेना चाहिए |
भोजन में सप्राण भोजन [ अंकुरित अन्न ], ताजी हरी सब्जियों एवं फलों कि अधिकता रखनी चाहिए |

गुडुम्म और फोड़े

गुडुम्म और फोड़े

गुडुम्म और फोड़े के उपचार हेतु पीपल की पकी हुई कठोर छाल उतार लाएँ और जलाकर राख कर दें। इस राख को तेल में गर्म करके मरहम बना लें और फोड़े पर लेप दें। एक-दो लेप में ही फोड़ा पककर बह जाएगा और घाव भरने लगेगा। यह राख घाव में भर देने से पानी के संसर्ग या छूत के विकार से भी बचाती है। घाव में नयी त्वचा भरने में भी यह मदद करती है।
नमक, हल्दी, धनिया से बढ़ती है सुख-समृद्धि

आपने बड़े-बूढ़ों को यह कहते हुए सुना होगा कि जिस घर में नमक बंधा हो, तो वहां बरकत रहती है। लक्ष्मी को कमल पर आसीन माना गया है। हल्दी की गाठों को साक्षात गणेश का रूप माना गया है और धनियां को इसलिए इस नाम से पुकारा जाता है क्योंकि वह धन का आवाह्न करता है।

जिस घर में नमक, खड़ा धनिया , हल्दी की गांठे और कमल गट्टों को कुछ मात्रा में ही सही संजोकर रखा जाता है वहां निश्चित बरकत होती है।

साबूत नमक को पर्याप्त मात्रा में ईशान यानी उत्तर-पूर्व दिशा में रखने से विपरीत दिशा में शौचालय होने का दोष कम हो जाता है। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।

कुछ परंपराएं दाढ़ी बनाने या बाल कटवाने से संबंधित

शास्त्रों के अनुसार दैनिक जीवन में शुभ फल पाने के लिए कई ऐसी परंपराएं बताई गई हैं, जिनका पालन आज भी किया जाता है। ऐसी ही कुछ परंपराएं दाढ़ी बनाने या बाल कटवाने से संबंधित हैं। यहां जानिए इस काम से संबंधित परंपराएं, हमें कब दाढ़ी बनानी चाहिए और कब नहीं, कब बाल कटवाने चाहिए और कब नहीं...
इन दिनों में न करें ये काम
शास्त्रों कहते हैं कि मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को बाल नहीं कटवाना चाहिए। यह अपशकुन माना जाता है। आज भी घर के बड़े और बुजुर्गों द्वारा बताया जाता है कि शनिवार, मंगलवार और गुरुवार के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए।
शास्त्रों की मान्यता
- शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि मंगलवार को बाल कटवाने से हमारी आयु आठ माह कम हो जाती है।
- गुरुवार देवी लक्ष्मी का दिन माना जाता है, अत: इस दिन बाल कटवाने से धन की हानि होने की संभावनाएं रहती हैं।
- शनिवार को बाल कटवाने से आयु में सात माह की कमी हो जाती है।
- शेष चार दिन सोमवार, बुधवार, शुक्रवार और रविवार को बाल कटवा सकते हैं। इन दिनों में ये काम करने पर दोष नहीं लगता है।
ज्योतिष की मान्यता
ज्योतिष के अनुसार मंगलवार मंगल देव का दिन है। शरीर में मंगल का निवास हमारे रक्त में रहता है और रक्त से बालों की उत्पत्ति होती है। इसी तरह शनिवार शनि ग्रह का दिन हैं और शनि का संबंध हमारी त्वचा से होता है। अत: मंगलवार और शनिवार को बाल कटवाने से मंगल तथा शनि ग्रह संबंधी अशुभ प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं। इनसे बचने के लिए ही इन दिनों में बाल ना कटवाने की बात कही जाती है।
हालांकि आजकल इन बातों को केवल अंधविश्वास ही माना जाता है, लेकिन मान्यता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने जो परंपराएं बनाई हैं, इनका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
ये हैं प्रचलित कारण
ऐसा माना जाता है कि सप्ताह के कुछ ऐसे दिन हैं, जब ग्रहों से ऐसी किरणें निकलती है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। शनिवार, मंगलवार और गुरुवार को निकलने वाली इन किरणों का सीधा प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है। हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण भाग मस्तिष्क ही है, सिर का मध्य भाग अति संवेदनशील और बहुत ही कोमल होता है। जिसकी सुरक्षा बालों से होती है। इसी वजह से इन दिनों में बालों को नहीं कटवाना चाहिए।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

!! श्री महाकाली !!

!! श्री महाकाली !!
दुर्गाजी का एक रुप कालीजी है। यह देवी विशेष रुप से शत्रुसंहार, विघ्ननिवारण, संकटनाश और सुरक्षा की अधीश्वरी है।
यह तथ्य प्रसिद्ध है कि इनकी कृपा मात्र से भक्त को ज्ञान, सम्पति, यश और अन्य सभी भौतिक सुखसमृद्धि के साधन प्राप्त हो सकते है, पर विशेष रुप से इनकी उपासन्न सुरक्षा, शौर्य, पराक्रम, युद्ध, विवाद और प्रभाव विस्तर के संदर्भ में की जाती है। कालीजी की रुपरेखा भयानक है। देखकर सहसा रोमांच हो आता है। पर वह उनका दुष्टदलन रुप है।
भक्तों के प्रति तो वे सदैव ही परम दयालु और ममतामयी रहती है। उनकी पूजा के द्वारा व्यक्ति हर प्रकार की सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त कर सकता है।
विधि -
लाल आसन पर कालीजी की प्रतिमा अथवा चित्र या यन्त्र स्थापित करके, लाल चन्दन, पुष्प तथा धूपदीप से पूजा करके मन्त्र जप करना चाहिए। नियमत रुप से श्रद्धापूर्वक आराधना करने वालि जनों को कालीजी(प्रायः सभी शक्ति स्वरुप) स्वप्न मे दर्शन देती है। ऐसे दर्शन से घबङाना नहीं चाहिए और उस स्वप्न की कहीं चर्चा भी नही चाहिए। कालीजी की पुजा में बली का विधान भी है। किन्त सात्विक उपासना की दृष्टि से बलि के नाम पर नारियल अथवा किसी फल का प्रयोग किया जा सकता है।
वैसै, देवी - देवता मात्र श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाते है, ये भौतिक उपादान उनकी दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते । कुछ भी न हो और कोई साधक केवल श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति ही करता रहे, तो भी वह सफल मनोरथ हो सकता है।
धयान स्तुति-
खडगं गदेषु चाप परिघां शूलम भुशुंडी शिरः
शंखं संदधतीं करैस्तिनयनां सर्वाग भूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाद द्शकां सेवै महाकालिकाम्।
यामस्तौत्स्वपितो हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम्॥
जप मन्त्र-
ॐ क्रां क्रीं क्रूं कालिकाय नमः।
प्रार्थना-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै ससतं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै निततां प्रणतां स्मताम्॥
महाकाली मंत्र :-
ऊं ए क्लीं ह्लीं श्रीं ह्सौ: ऐं ह्सौ: श्रीं ह्लीं क्लीं ऐं जूं क्लीं सं लं श्रीं र: अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋं लं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: ऊं कं खं गं घं डं ऊं चं छं जं झं त्रं ऊं टं ठं डं ढं णं ऊं तं थं दं धं नं ऊं पं फं बं भं मं ऊं यं रं लं वं ऊं शं षं हं क्षं स्वाहा।
विधि :-
यह महाकाली का उग्र मंत्र है। इसकी साधना विंध्याचल के अष्टभुजा पर्वत पर त्रिकोण में स्थित काली खोह में करने से शीघ्र सिद्धि होती है अथवा श्मशान में भी साधना की जा सकती है, लेकिन घर में साधना नहीं करनी चाहिए। जप संख्या 1100 है, जिन्हें 90 दिन तक अवश्य करना चाहिए। दिन में महाकाली की पंचोपचार पूजा करके यथासंभव फलाहार करते हुए निर्मलता, सावधानी, निभीर्कतापूर्वक जप करने से महाकाली सिद्धि प्रदान करती हैं। इसमें होमादि की आवश्यकता नहीं होती।
फल :-
यह मंत्र सार्वभौम है। इससे सभी प्रकार के सुमंगलों, मोहन, मारण, उच्चाटनादि तंत्रोक्त षड्कर्म की सिद्धि होती है। 

गन्ने के रस का लाभ


ग्रीष्म ऋतु में शरीर का जलीय व स्निग्ध अंश कम हो जाता है। गन्ने का रस शीघ्रता से इसकी पूर्ति कर देता है। यह जीवनीशक्ति व नेत्रों की आर्द्ररता को कायम रखता है। इसके नियमित सेवन से शरीर का दुबलापन, पेट की गर्मी, हृदय की जलन व कमजोरी दूर होती है।
गन्ने को साफ करके चूसकर खाना चाहिए। सुबह नियमित रूप से गन्ना चूसने से पथरी में लाभ होता है।
अधिक गर्मी के कारण उलटी होने पर गन्ने के रस में शहद मिलाकर पीने से शीघ्र राहत मिलती है।
एक कप गन्ने के रस में आधा कप अनार का रस मिलाकर पीने से खूनी दस्त मिट जाते हैं।
थोड़ा सा नीँबू व अदरक मिलाकर बनाया गया गन्ने का रस पेट व हृदय के लिए हितकारी है।
सावधानीः मधुमेह (डायबिटीज), कफ व कृमि के रोगियों को गन्ने का सेवन नहीं करना चाहिए।
विशेष ध्यान देने योग्यः आजकल अधिकतर लोग मशीन, जूसर आदि से निकाला हुआ रस पीते हैं। 'सुश्रुत संहिता' के अनुसार यंत्र से निकाला हुआ रस पचने में भारी, दाहकारी कब्जकारक होने के साथ संक्रामक कीटाणुओं से युक्त भी हो सकता है। अतः फल चूसकर या चबाकर खाना स्वास्थ्यप्रद है।

गर्भाधान संस्कार

16 संस्कारो मे क्यो जरूरी है ? पहला संस्कार गर्भाधान ।
1- गर्भाधान संस्कार का आध्यात्मिक रहश्य ।
आजकल की युवा पीड़ी और नास्तिक लोग इन आध्यात्मिक सिद्धांतों को नकार देते है । इसका मुख्य कारण उनकी अनविज्ञता होती है । वो जानना ही नहीं चाहते है कि आखिर आध्यात्म क्या है ?
गर्भाधान संस्कार मे सबसे पहले गर्भ धारण की स्थिति और साम्य को देखा जाता है । अगर ज्योतिष के अनुसार ब्रहमाण्ड मे ग्रहो की गति अनुकूल है तथा ग्रह स्व राशिगत या उच्च स्थिति मे भ्रमण कर रहे है तो समय अनुकूल है ।
जैसे किसान फसल के लिए अपने खेत को तैयार करता है तथा उचित समय पर ही फसल को बोता है तो ही अच्छी फसल होती है । अगर फसल उचित समय पर न बोई जाये तथा खेत को अच्छे से तैयार न किया जाये तो फसल या तो उगती नहीं है या उसकी किस्म उन्नत पैदा नहीं होती है ।
इसी प्रकार गर्भ धारण के लिए उचित समय , मुहूर्त और उचित तिथियो की आवश्यकता होती है । अन्यथा बच्चे का भविष्य और विकाश उन्नत नहीं होता है । गर्भ धारण तनाव मुक्त होकर तथा मन आत्मा को प्रसन्न अवस्था मे रखते हुए करना चाहिए । जितनी मन की प्रसन्न मुद्रा रहेगी तो उतने ही उन्नत शुक्राणु और अंडे का मिलन होगा ।
तनाव मे , क्रोध मे , डर मे , चोरी से छिपकर और भयभीत अवस्था मे किया गये गर्भ धारण मे पैदा होने वाले बच्चे हमेशा इन्ही परिष्टिथियों से गुजरते है ।
इसलिए ऋषिओ ने कहा कि गर्भधारण संस्कार ही मनुष्य के जीवन की नीव होती है । 

चमत्कारी टोटके (कार्यसिद्दी हेतु)


१) चुटकी भर हींग अपने सिर से घुमाकर (उतारा कर) दक्षिण दिशा में फ़ेंक कर जाए |
२) एक हरी इलायची या एक लौंग शिवजी के चरणों में रखकर जाए |
३) शनिवार के दिन एक रुपये का सिक्का या सरसों का तेल किसी कोढ़ी को दान करे. |
४) हरिद्रा के कुछ दाने व्यापार स्थल के द्वार पर फ़ेंक कर जाए |
5) रसायन रहित गुड या चमेली का तेल मंगलवार को हनुमान जी के आगे रखकर जाए.|
६) महाकाली का पूजन शुद्ध घी के दीपक से करे.|
७) काम में जाने से पहले पूजा घर में रखे जल कलश को प्रणाम करके जाए.|
८) दर्पण में स्वयं का चेहरा देखकर जाए.|
९) हर बुधवार एक कटोरी चावल दान कर गणेशजी पर एक सुपारी एक वर्ष तक चढ़ाये |
१०) हनुमान जी की मूर्ति से सिंदूर ले माँ सीता के चरणों में एक ही सांस में लगा दे |.

मुनक्का

मुनक्का
1) कब्ज के रोगियों को रात्रि में मुनक्का और सौंफ खाकर सोना चाहिए। कब्ज दूर करने की यह रामबाण औषधि है।
2) भूने हुए मुनक्के में लहसुन मिलाकर सेवन करने से पेट में रुकी हुई वायु (गैस) बाहर निकल जाती है और कमर के दर्द में लाभ होता है।
3) यदि किसी को कब्ज़ की समस्या है तो उसके लिए शाम के समय 10 मुनक्कों को साफ़ धोकर एक गिलास दूध में उबाल लें फिर रात को सोते समय इसके बीज निकल दें और मुनक्के खा लें तथा ऊपर से गर्म दूध पी लें , १इस प्रयोग को नियमित करने से लाभ स्वयं महसूस करें | इस प्रयोग से यदि किसी को दस्त होने लगें तो मुनक्के लेना बंद कर दें |
4) पुराने बुखार के बाद जब भूख लगनी बंद हो जाए तब 10 -12 मुनक्के भून कर सेंधा नमक व कालीमिर्च मिलाकर खाने से भूख बढ़ती है |
5) बच्चे यदि बिस्तर में पेशाब करते हों तो उन्हें 2 मुनक्के बीज निकालकर व उसमें एक-एक काली मिर्च डालकर रात को सोने से पहले खिला दें , यह प्रयोग लगातार दो हफ़्तों तक करें , लाभ होगा |
6) मुनक्के के सेवन से कमजोरी मिट जाती है और शरीर पुष्ट हो जाता है |
7) मुनक्के में लौह तत्व Iron की मात्रा अधिक होने के कारण यह Haemoglobin खून के लाल कण को बढ़ाता हैै |
8) 4-5 मुनक्के पानी में भिगोकर खाने से चक्कर आने बंद हो जाते हैं |
9) 10 -12 मुनक्के धोकर रात को पानी में भिगो दें | सुबह को इनके बीज निकालकर खूब चबा -चबाकर खाएं , तीन हफ़्तों तक यह प्रयोग करने से खून साफ़ होता है तथा नकसीर में भी लाभ होता है |
10) 5 मुनक्के लेकर उसके बीज निकल लें , अब इन्हें तवे पर भून लें तथा उसमें कालीमिर्च का चूर्ण मिला लें | इन्हें कुछ देर चूस कर चबा लें ,खांसी में लाभ होगा |

भगवान विष्णु का स्वप्न


एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे। स्वप्न में वे क्या देखते हैं कि करोड़ों चंद्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल-डमरूधारी, स्वर्णाभरण-भूषित, सुरेंद्र वंदित, अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गद्गद हो सहसा शय्या पर उठकर बैठा गए और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे। उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर श्रीलक्ष्मीजी उनसे पूछने लगीं कि ‘भगवन्! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?’ भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे। अंत में कुछ स्वस्थ होने पर वे गद्गद-कंठ से इस प्रकार बोले - ‘हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छबि ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है। अहोभाग्य्! चलो, कैलास में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करें।’
यह कहकर दोनों कैलास की ओर चल दिये। मुश्किल से आधी दूर गये होंगे कि देखते हैं भगरान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी ओर चले आ रहे हैं। अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गयी।पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। मानो प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा। एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया। दोनों ही एक दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर मूकवत् खड़े रहे। प्रश्नोत्तर होने पर मालूम हुआ कि शंकरजी को भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानो विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे। दोनों के स्वप्न का वृत्तांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दूसरे से अपने यहां लिवा जाने का आग्रह करने। नारायण कहते वैकुंठ चलो और शंभु कहते कैलास की ओर प्रस्थान कीजिए। दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाय। इतने में ही क्या देखते हैं कि वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारदजी कहीं से आ निकले। बस, फिर क्या था? लगे दोनों ही उनसे निर्णय कराने कि कहां चला जाय? बेचारे नारदजी तो स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखार; वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गए और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दें वही ठीक है। भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं। अंत में वे दोनों को लक्ष्य करके बोलीं - ‘हे नाथ! हे नारायण! आप लोगों के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास-स्थान अलग-अलग नहीं हैं, जो कैलास है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलास है, केवल नाम में ही भेद है। यही नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में द्प हैं। और तो और मुझे तो अब यह स्पष्ट दीखने लगा है कि आपकी भार्याएं भी एक ही हैं, दो नहीं। जो मैं हूं वही श्रीलक्ष्मी हैं और जो श्रीलक्ष्मी हैं वही मैं हूं। केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानो दूसरे के प्रति ही करता है, एक की जो पूजा करता है, वह स्वभाविक ही दूसरे की भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है, वह दूसरे की भी पूजा नहीं करता। मैं तो यह समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। मैं देखती हीं कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे हैं, मुझे चक्कर में डाल रहे हैं, मुझे भुला रहे हैं। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिए। श्रीविष्णु यह समझें कि हम शिवरूप से वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णुरूप से कैलास गमन कर रहे हैं।’
इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए दोनों प्रणामालिंगन के अनंतर हर्षित हो अपने-अपने लोक को चले गए।
लौटकर जब श्रीविष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगीं कि - ‘प्रभो! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन हैं?’ इस पर भगवान बोले - ‘प्रिये! मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर हैं। देहधारियों को अपने देह की भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय हैं। एक बार मैं और शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घूमने निकले। मैं अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा। थोड़ी देर के बाद मेरी श्रीशंकरजी से भेंट जो गयी। ज्यों ही हम लोगों की चार आंखें हुईं कि हम लोग पूर्वजन्मार्जित विज्ञा की भांति एक्-दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गए। ‘वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं। अलग-अलग दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिव की अर्चा करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव की पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।’

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

घरेलू नुस्खे

घरेलू नुस्खे
सरदर्द के लिए अचूक "प्राकृतिक चिकित्सा "मात्र पांच मिनट में सरदर्द "गायब"
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नाक के दो हिस्से हैं दायाँ स्वर और बायां स्वर जिससे हम सांस लेते और छोड़ते हैं ,
पर यह बिलकुल अलग - अलग असर डालते हैं और आप फर्क महसूस कर सकते हैं |
दाहिना नासिका छिद्र "सूर्य" और बायां नासिका छिद्र "चन्द्र" के लक्षण को दर्शाता है
या प्रतिनिधित्व करता है |
सरदर्द के दौरान, दाहिने नासिका छिद्र को बंद करें और बाएं से सांस लें |
और बस ! पांच मिनट में आपका सरदर्द "गायब" है ना आसान ?? और यकीन मानिए
यह उतना ही प्रभावकारी भी है..
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अगर आप थकान महसूस कर रहे हैं तो बस इसका उल्टा करें...
यानि बायीं नासिका छिद्र को बंद करें और दायें से सांस लें ,और बस ! थोड़ी ही देर में "तरोताजा" महसूस करें |
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दाहिना नासिका छिद्र "गर्म प्रकृति" रखता है और बायां "ठंडी प्रकृति"
अंधिकांश महिलाएं बाएं और पुरुष दाहिने नासिका छिद्र से सांस लेते हैं और तदनरूप क्रमशः ठन्डे और गर्म प्रकृति के होते हैं सूर्य और चन्द्रमा की तरह |
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प्रातः काल में उठते समय अगर आप बायीं नासिका छिद्र से सांस लेने में बेहतर महसूस कर रहे हैं तो आपको थकान जैसा महसूस होगा, तो बस बायीं नासिका
छिद्र को बंद करें, दायीं से सांस लेने का प्रयास करें और तरोताजा हो जाएँ |
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अगर आप प्रायः सरदर्द से परेशान रहते हैं तो इसे आजमायें ,दाहिने को बंद कर बायीं नासिका छिद्र से सांस लें बस इसे नियमित रूप से एक महिना करें और स्वास्थ्य लाभ लें ==============
तो बस इन्हें आजमाइए और बिना दवाओं के स्वस्थ महसूस करें

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

बगुला मुखी वल्गा मुखी बगला मुखी

बगुला मुखी वल्गा मुखी बगला मुखी .पीताम्बरा आदि नामो से प्रचलित है देबी भगवती बगलामुखी को स्तम्भन की देवी कहा गया है।
स्तम्भनकारिणी शक्ति नाम रूप से व्यक्त एवं अव्यक्त सभी पदार्थो की स्थिति का आधार पृथ्वी के रूप में शक्ति ही है, और बगलामुखी उसी स्तम्भन शक्ति की अधिस्ठात्री देवी हैं।
इसी स्तम्भन शक्ति से ही सूर्यमण्डल स्थित है,
सभी लोक इसी शक्ति के प्रभाव से ही स्तंभित है।
अतः साधक गण को चाहिये कि ऐसी महाविद्या कि साधना सही रीति व विधानपूर्वक ही करें।
अब हम साधकगण को इस महाविद्या के विषय में कुछ और जानकारी देना आवश्यक समझते है, जो साधक इस साधना को पूर्ण कर, सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इन तथ्यो की जानकारी होना अति आवश्यक है।
1 ) कुल : – महाविद्या बगलामुखी “श्री कुल” से सम्बंधित है।
2 ) नाम : – बगलामुखी, पीताम्बरा , बगला , वल्गामुखी , वगलामुखी , ब्रह्मास्त्र विद्या
3 ) कुल्लुका : – मंत्र जाप से पूर्व उस मंत्र कि कुल्लुका का न्यास सिर में किया जाता है। इस विद्या की कुल्लुका “ॐ हूं छ्रौम्” (OM HOOM Chraum)
4) महासेतु : – साधन काल में जप से पूर्व ‘महासेतु’ का जप किया जाता है। ऐसा करने से लाभ यह होता है कि साधक प्रत्येक समय, प्रत्येक स्थिति में जप कर सकता है। इस महाविद्या का महासेतु “स्त्रीं” (Streem) है। इसका जाप कंठ स्थित विशुद्धि चक्र में दस बार किया जाता है।
5) कवचसेतु :- इसे मंत्रसेतु भी कहा जाता है। जप प्रारम्भ करने से पूर्व इसका जप एक हजार बार किया जाता है। ब्राह्मण व छत्रियों के लिए “प्रणव “, वैश्यों के लिए “फट” तथा शूद्रों के लिए “ह्रीं” कवचसेतु है।
6 ) निर्वाण :- “ह्रूं ह्रीं श्रीं” (Hroom Hreem Shreem) से सम्पुटित मूल मंत्र का जाप ही इसकी निर्वाण विद्या है। इसकी दूसरी विधि यह है कि पहले प्रणव कर, अ , आ , आदि स्वर तथा क, ख , आदि व्यंजन पढ़कर मूल मंत्र पढ़ें और अंत में “ऐं” लगाएं और फिर विलोम गति से पुनरावृत्ति करें।
7 ) बंधन :- किसी विपरीत या आसुरी बाधा को रोकने के लिए इस मंत्र का एक हजार बार जाप किया जाता है। मंत्र इस प्रकार है ” ऐं ह्रीं ह्रीं ऐं ” (Aim Hreem Hreem Aim)
8) मुद्रा :- इस विद्या में योनि मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।
9) प्राणायाम : – साधना से पूर्व दो मूल मंत्रो से रेचक, चार मूल मंत्रो से पूरक तथा दो मूल मंत्रो से कुम्भक करना चाहिए। दो मूल मंत्रो से रेचक, आठ मूल मंत्रो से पूरक तथा चार मूल मंत्रो से कुम्भक करना और भी अधिक लाभ कारी है।
10 ) दीपन :- दीपक जलने से जैसे रोशनी हो जाती है, उसी प्रकार दीपन से मंत्र प्रकाशवान हो जाता है। दीपन करने हेतु मूल मंत्र को योनि बीज ” ईं ” ( EEM ) से संपुटित कर सात बार जप करें
11) जीवन अथवा प्राण योग : – बिना प्राण अथवा जीवन के मन्त्र निष्क्रिय होता है, अतः मूल मन्त्र के आदि और अन्त में माया बीज “ह्रीं” (Hreem) से संपुट लगाकर सात बार जप करें ।
12 ) मुख शोधन : – हमारी जिह्वा अशुद्ध रहती है, जिस कारण उससे जप करने पर लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। अतः “ऐं ह्रीं ऐं ” मंत्र से दस बार जाप कर मुखशोधन करें
13 ) मध्य दृस्टि : – साधना के लिए मध्य दृस्टि आवश्यक है। अतः मूल मंत्र के प्रत्येक अक्षर के आगे पीछे “यं” (Yam) बीज का अवगुण्ठन कर मूल मंत्र का पाँच बार जप करना चाहिए।
14 ) शापोद्धार : – मूल मंत्र के जपने से पूर्व दस बार इस मंत्र का जप करें –
” ॐ हलीं बगले ! रूद्र शापं विमोचय विमोचय ॐ ह्लीं स्वाहा ”
(OM Hleem Bagale ! Rudra Shaapam Vimochaya Vimochaya OM Hleem Swaahaa )
15 ) उत्कीलन : – मूल मंत्र के आरम्भ में ” ॐ ह्रीं स्वाहा ” मंत्र का दस बार जप करें।
16 ) आचार :- इस विद्या के दोनों आचार हैं, वाम भी और दक्षिण भी ।
17 ) साधना में सिद्धि प्राप्त न होने पर उपाय : – कभी कभी ऐसा देखने में आता हैं कि बार बार साधना करने पर भी सफलता हाथ नहीं आती है। इसके लिए आप निम्न वर्णित उपाय करें –
a) कर्पूर, रोली, खास और चन्दन की स्याही से, अनार की कलम से भोजपत्र पर वायु बीज “यं” (Yam) से मूल मंत्र को अवगुण्ठित कर, उसका षोडशोपचार पूजन करें। निश्चय ही सफलता मिलेगी।
b) सरस्वती बीज “ऐं” (Aim) से मूल मंत्र को संपुटित कर एक हजार जप करें।
c) भोजपत्र पर गौदुग्ध से मूल मंत्र लिखकर उसे दाहिनी भुजा पर बांध लें। साथ ही मूल मंत्र को “स्त्रीं” (Steem) से सम्पुटित कर उसका एक हजार जप करें
18 ) विशेष : – गंध,पुष्प, आभूषण, भगवती के सामने रखें। दीपक देवता के दायीं ओर व धूपबत्ती बायीं ओर रखनी चाहिए। नैवेद्य (Sweets, Dry Fruits ) भी देवता के दायीं ओर ही रखें। जप के उपरान्त आसन से उठने से पूर्व ही अपने द्वारा किया जाप भगवती के बायें हाथ में समर्पित कर दें।
अतः ऐसे साधक गण जो किन्ही भी कारणो से यदि अभी तक साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकें हैं, उपर्युक्त निर्देशों का पालन करते हुए पुनः एक बार फिर संकल्प लें, तो निश्चय ही पराम्बा पीताम्बरा की कृपा दृस्टि उन्हें प्राप्त होगी..

नवार्ण मन्त्र विधि:

नवार्ण मन्त्र विधि:
श्रीगणपतिर्जयति
ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
१. ऋष्यादिन्यास :
ब्रम्हविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि
गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दोभ्यो नमः मुखे
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि
ऐं बीजाय नमः गुह्ये
ह्रीं शक्तये नमः पादयो
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे :- इस मूल मन्त्र से हाथ धोकर करन्यास करें।
२. करन्यास:
ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों हाथों की तर्जनी अँगुलियों से अंगूठे के उद्गम स्थल को स्पर्श करें )
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से तर्जनी अँगुलियों का स्पर्श करें )
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श करें )
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से अनामिका अँगुलियों का स्पर्श करें )
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से कनिष्ट/ कानी / छोटी अँगुलियों का स्पर्श करें )
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ( हथेलियों और उनके पृष्ठ भाग का स्पर्श )
३. हृदयादिन्यास :
ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से ह्रदय का स्पर्श )
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (शिर का स्पर्श )
ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखा का स्पर्श)
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् ( दाहिने हाथ की अँगुलियों से बाएं कंधे एवं बाएं हाथ की अँगुलियों से दायें कंधे का स्पर्श)
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ( दाहिने हाथ की उँगलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और मस्तक में भौंहों के मध्यभाग का स्पर्श)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट ( यह मन्त्र पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे ले जाकर दाहिनी ओर से आगे लाकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं।
४. वर्णन्यास :
**इस न्यास को करने से साधक सभी प्रकार के रोगों से मुक्त हो जाता है**
ॐ ऐं नमः शिखायाम्
ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे
ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे
ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे
ॐ मुं नमः वामकर्णे
ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे
ॐ यैं नमः वामनासापुटे
ॐ विं नमः मुखे
ॐ च्चें नमः गुह्ये
इस प्रकार न्यास करके मूलमंत्र से आठ बार व्यापक न्यास (दोनों हाथों से शिखा से लेकर पैर तक सभी अंगों का ) स्पर्श करें।
अब प्रत्येक दिशा में चुटकी बजाते हुए निम्न मन्त्रों के साथ दिशान्यास करें:
५. दिशान्यास:
ॐ ऐं प्राच्यै नमः
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः
ॐ ह्रीं नैऋत्यै नमः
ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः
ॐ क्लीं वायव्यै नमः
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे उर्ध्वायै नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः
अन्य न्यास :- यदि साधक चाहे तो इतने ही न्यास करके नवार्ण मन्त्र का जप आरम्भ करे किन्तु यदि उसे और भी न्यास करने हों तो वह भी करके ही मूल मन्त्र जप आरम्भ करे।
यथा :-
६. सारस्वतन्यास :
**इस न्यास को करने से साधक की जड़ता समाप्त हो जाती है**
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अनामिकाभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः हृदयाय नमः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिरसे स्वाहा
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिखायै वषट्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः कवचाय हुम्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अस्त्राय फट
७. मातृकागणन्यास :
**इस न्यास को करने से साधक त्रैलोक्य विजयी होता है**
ह्रीं ब्राम्ही पूर्वतः माँ पातु
ह्रीं माहेश्वरी आग्नेयां माँ पातु
ह्रीं कौमारी दक्षिणे माँ पातु
ह्रीं वैष्णवी नैऋत्ये माँ पातु
ह्रीं वाराही पश्चिमे माँ पातु
ह्रीं इन्द्राणी वायव्ये माँ पातु
ह्रीं चामुण्डे उत्तरे माँ पातु
ह्रीं महालक्ष्म्यै ऐशान्यै माँ पातु
ह्रीं व्योमेश्वरी उर्ध्व माँ पातु
ह्रीं सप्तद्वीपेश्वरी भूमौ माँ पातु
ह्रीं कामेश्वरी पतालौ माँ पातु
८. षड्देविन्यास
**इस न्यास को करने से वृद्धावस्था एवं मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है**
कमलाकुशमण्डिता नंदजा पूर्वांग मे पातु
खडगपात्रकरा रक्तदन्तिका दक्षिणाङ्ग मे पातु
पुष्पपल्लवसंयुता शाकम्भरी प्रष्ठांग मे पातु
धनुर्वाणकरा दुर्गा वामांग मे पातु
शिरःपात्रकराभीमा मस्तकादि चरणान्तं मे पातु
चित्रकान्तिभूत भ्रामरी पादादि मस्तकान्तम् मे पातु
९. ब्रह्मादिन्यास
**इस न्यास को करने से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं**
ॐ सनातनः ब्रह्मा पाददीनाभिपर्यन्त मा पातु
ॐ जनार्दनः नाभिर्विशुद्धिपर्यन्तं मा पातु
ॐ रुद्रस्त्रिलोचनः विशुद्धेर्ब्रह्मरन्ध्रांतं मा पातु
ॐ हंसः पदद्वयं मा पातु
ॐ वैनतेयः करद्वयं मा पातु
ॐ वृषभः चक्षुषी मा पातु
ॐ गजाननः सर्वाङ्गानि मा पातु
ॐ आनंदमयो हरिः परापरौ देहभागौ मा पातु
१०. महालक्ष्मयादिन्यास
**इस न्यास को करने से धन-धान्य के साथ-साथ सद्गति की प्राप्ति होती है **
ॐ अष्टादशभुजान्विता महालक्ष्मी मध्यं मे पातु
ॐ अष्टभुजोर्विता सरस्वती उर्ध्वे मे पातु
ॐ दशभुजसमन्विता महाकाली अधः मे पातु
ॐ सिंहो हस्त द्वयं मे पातु
ॐ परंहंसो अक्षियुग्मं मे पातु
ॐ दिव्यं महिषमारूढो यमः पादयुग्मं मे पातु
ॐ चण्डिकायुक्तो महेशः सर्वाङ्गानी मे पातु
११. बीजमन्त्रन्यास :
ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से ह्रदय का स्पर्श )
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (शिर का स्पर्श )
ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखा का स्पर्श)
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् ( दाहिने हाथ की अँगुलियों से बाएं कंधे एवं बाएं हाथ की अँगुलियों से दायें कंधे का स्पर्श)
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ( दाहिने हाथ की उँगलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और मस्तक में भौंहों के मध्यभाग का स्पर्श)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट ( यह मन्त्र पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे ले जाकर दाहिनी ओर से आगे लाकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं।
१२. विलोमबीजन्यास :

**इस न्यास को समस्त दुःखहर्ता के नाम से भी जाना जाता है**
ॐ च्चें नमः गुह्ये
ॐ विं नमः मुखे
ॐ यैं नमः वामनासापुटे
ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे
ॐ मुं नमः वामकर्णे
ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे
ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे
ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे
ॐ ऐं नमः शिखायाम्
१३. मन्त्रव्याप्तिन्यास:
**इस न्यास को करने से देवत्व की प्राप्ति होती है**
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाचरणान्तं पूर्वाङ्गे (आठ बार )
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पादाच्छिरोंतम दक्षिणाङ्गे (आठ बार)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पृष्ठे (आठ बार)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे वामांगे (आठ बार)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाच्चरणात्नं (आठ बार)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे चरणात्मस्तकावधि (आठ बार)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इसके पश्चात मूल मन्त्र के १०८/१००८ अथवा अधिक अपनी सुविधानुसार जप संपन्न करें।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

बार बार बीमार पड़ते हैं और आपका स्वास्थ ठीक नहीं रहता तो

यदि आप बार बार बीमार पड़ते हैं और आपका स्वास्थ ठीक नहीं रहता तो ये साधना आपके लिए वरदान साबित होगी ।
ज्वालामालिनी साधना :-
भगवान् शिव की ही एक प्रचंड शक्ति हैं ज्वालामालिनी । इनकी कृपा से साधक का शरीर हृष्ट-पुष्ट एवं सदा स्वस्थ रहता है । इतना ही नहीं, इनके साधक ने यदि इन्हें पूर्ण रूप से सिद्ध कर लिया तो उसके स्पर्श मात्र से ही दूसरों के रोग, व्याधि इत्यादि ठीक हो जाते हैं । यदि आप बार बार बीमार पड़ते हैं और आपका स्वास्थ ठीक नहीं रहता तो ये साधना आपके लिए वरदान साबित होगी ।
इसे संकल्प के द्वारा किसी दुसरे के लिए भी किया जा सकता है । नीचे ये अनमोल साधना दी जा रही है ।
दिशा :- पूर्व । आसन एवं वस्त्र :- श्वेत । माला:- रुद्राक्ष । संख्या :- 21 माला 11 दिनों तक । और एक चैतन्य शिवलिंग ।
॥ ॐ ज्र्म ज्र्म ज्वालामालिनी सर्वभूत संहार-कारिके जातवेदसी ज्वलन्ती प्रज्व्लन्ति ज्वल-ज्वल प्रज्वल हूं रं रं हूं फट ॥
!! विधि :- किसी भी सोमवार से यह साधना आरम्भ की जा सकती है । अपने सामने बजोट पे शिवलिंग स्थापित करें और उसका लघु पूजन करें ।
फिर संकल्प लेकर यह साधना पूर्ण एकाग्रता एवं भक्ति-भाव से 11 दिनों तक करें । 12वे दिन इसी मंत्र के अंत में स्वाहा लगाकर 11 माला आहुति शुद्ध घी से प्रदान करें ।

॥ श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम् ॥

॥ श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम् ॥
वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् ।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् ।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न ।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् ।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् ।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलङ्कदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् ।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः ।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः ।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे ।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥
||इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय

|| दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय ||
तंत्र शास्त्र में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष महत्व है। इस शंख को विधि-विधान पूर्वक घर में रखने से कई प्रकार की बाधाएं शांत हो जाती है और धन की भी कमी नहीं होती। दक्षिणावर्ती शंख के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसे घर में रखने से पहले इसका शुद्धिकरण अवश्य करना चाहिए।
इस विधि से करें शुद्धिकरण
लाल कपड़े के ऊपर दक्षिणावर्ती शंख को रखकर इसमें गंगाजल भरें और कुश के आसन पर बैठकर इस मंत्र का जप करें-
ऊं श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:
इस मंत्र की कम से कम 5 माला जप करें।
ये हैं दक्षिणावर्ती शंख के उपाय
1- दक्षिणावर्ती शंख को अन्न भण्डार में रखने से अन्न, धन भण्डार में रखने से धन, वस्त्र भण्डार में रखने से वस्त्र की कभी कमी नहीं होती। शयन कक्ष में इसे रखने से शांति का अनुभव होता है।
2- इसमें शुद्ध जल भरकर, व्यक्ति, वस्तु, स्थान पर छिड़कने से दुर्भाग्य, अभिशाप, तंत्र-मंत्र आदि का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
3- किसी भी प्रकार के टोने-टोटके इस शंख के आगे निष्फल हो जाते हैं। दक्षिणावर्ती शंख जहां भी रहता है, वहां धन की कोई कमी नहीं रहती।
4- इसे घर में रखने से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।

नवरात्रि विशेष : हत्था जोड़ी

नवरात्रि विशेष : हत्था जोड़ी
अगर आपको स्टॉक मार्किट में फैयदा नहीं हो रहा है या मेहनत करने पर भी धन की प्राप्ति नहीं होती काम बिगड़ जाते है ,अगर व्यापार न चल पा रह हो यां जीवन में उन्नति न हो पा रही हो ,कई बार इर्षा के कारण कुछ लोग तंत्र प्रयोग कर देते हैं जिससे दूकान में ग्राहक नहीं आते यां कार्य सफल नहीं होते.
यह हत्था जोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी तांत्रिक वस्तु है ।मुकदमा ,शत्रु संघर्ष ,दरिद्रता ,व दुर्लभ आदि के निवारण में इसके जैसी चमत्कारी वस्तु आज तक देखने में नही आई इसमें वशीकरण को भी अदुभूत शक्ति है , भूत दृप्रेत आदि का भय नही रहता यदि इसे नवरात्रि / शुभ दिन में तांत्रिक विधि से सिध्द कर दिया जाए तो साधक निष्चित रूप से चामुण्डा देवी का कृपा पात्र हो जाता है यह जिसके पास होती है उसे हर कार्य में सफलता मिलती है धन संपत्ति देने वाली यह बहुत चमत्कारी साबित हुई है तांत्रिक वस्तुओं में यह महत्वपूर्ण है ।
हत्था जोड़ी में अद्भुत प्रभाव निहित रहता है, यह साक्षात चामुंडा देवी का प्रतिरूप है. हत्था जोड़ी से सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा ,शत्रु दमन तथा मुकदमो में विजय हासिल होती है !
तिजोरी में सिन्दूर युक्त हत्था जोड़ी रखने से आर्थिक लाभ में वृद्धि होने लगती है.
कभी धन की याचना नहीं करनी पड़ती अपितु धन उसकी और स्वयं ही आकर्षित होता रहता है …और धन-सम्पति, वशीकरण, शत्रु शमन मे व्यक्ति सशक्त हो जाता है l जिस व्यक्ति के पास यह होती है l उसे किसी बात कि कमी नहीं होती l उसकी लगभग सभी इछचाये पूर्ण हो जाती है l

घर में नहीं हो रही है बरकत तो करे ये उपाय :-

घर में नहीं हो रही है बरकत तो करे ये उपाय :-
किसी के पास पैसा है तो शांति और सुख नहीं है| किसी के पास सुख शांति है तो पैसा नहीं है मतलब हर कोई किसी ना किसी तरीके से परेशान ही है| इसीलिये कुछ ऐसे उपाय बताना चाहते है जिसको अपने जीवन में लाने से आपको कभी धन और सुख समृद्धि की कमी नहीं होगी और दिनों दिन आपका खज़ाना बढ़ेगा ही|
आइये जानते है उपाय:
• घर की स्त्री का सम्मान करें।

• दक्षिण दिशा में पैर करके न सोएं|
• जितना हो सके दान करे| और हमरे हिन्दू शास्त्रो मे अन्न दान को सबसे बड़ा दान बताया गया है| जितना हो सके अन्न का दान करे| क्युकी प्रकृति का यह नियम है कि आप जितना देते हैं वह उसे दोगुना करके लौटा देती है।
• अग्निहोत्र करने से भी बहुत बरकत होती है| अग्निहोत्र मतलब जब भी भोजन खाएं उससे पहले उसे अग्नि को अर्पित करें। अग्नि द्वारा पकाए गए अन्न पर सबसे पहला अधिकार अग्नि का ही होता है।
• नल से पानी का टपकना आर्थिक क्षति का संकेत है। अगर आपके भी घर में भी ऐसा है तो टपकते नल को जल्द से जल्द ठीक करवाएं।
• वॉशरूम को गीला रखना आर्थिक स्थिति के लिए बेहतर नहीं होता है।
• घर में क्रोध, कलह और रोना-धोना आर्थिक समृद्धि व ऐश्वर्य का नाश कर देता है इसलिए घर में कलह-क्लेश पैदा न होने
• घर में जितना हो सके सफाई रखे| घर के चारों कोने साफ हों, खासकर ईशान, उत्तर और वायव्य कोण को हमेशा खाली और साफ रखें।
• घर में सीढ़ियों को पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण की ओर ही बनवाएं। कभी भी उत्तर-पूर्व में सीढ़ियां न बनवाएं।
• तिजोरी में हल्दी की कुछ गांठ एक पीले वस्त्र में बांधकर रखें। साथ में कुछ कौड़ियां और चांदी, तांबे आदि के सिक्के भी रखें। कुछ चावल पीले करके तिजोरी में रखें।
• घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाए गए फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।
• यदि आप अपार धन की इच्छा रखते हैं तो सबसे पहले हनुमानजी से अपने पापों की क्षमा मांगकर प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ते हुए 5 मंगलवार बढ़ के पत्ते पर आटे का दीया जलाकर उनके मंदिर में रखकर आएं।
• कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है तथा इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो जाता है। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। अतः घर में सुबह शाम आरती में कपूर जलाये|

स्कंदमाता पांचवा नवरात्रा:-

स्कंदमाता पांचवा नवरात्रा:-
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नवरात्र पर पांचवे दिन माँ के स्कंदमाता के रूप की पूजा की जाती है l स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माँ है | नौ ग्रहों की शांति के लिए स्कंदमाता की खास पूजा अर्चना की जाती है l ऐसामन जाता है कि नवरात्र के पांचवे दिन स्कंदमाता को खुश करने से बुरी ताकतों का नाश होता है और बुरी नज़र से मुक्ति मिलती है l देवी के इस रूप कि पूजा से असंभव काम भी संभव हो जाते हैं l 


उपाय (1) :-विवाह में आने वाली बाधा दूर करने के लिए ये उपाय बहुत ही कारगर है | 36 लौंग और 6 कपूर के टुकड़े लें | इसमे हल्दी और चावल मिलाकर इससे माँ दुर्गा को आहुति दें

उपाय (2) :-अगर आपको संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो आप लौग और कपूर में आनार के दाने मिला कर माँ दुर्गा को आहुति दें जरुर लाभ होगा | संतान प्राप्ति का सुख मिलेगा |

उपाय (3) :-अगर आप का कारोबार ठीक से नहीं चल रहा है तो दूर करने के लिए लौंग और कपूर में अमलताश के फूल मिलाएं ,अगर अमलताश नहीं है तो कोई भी पीला फूल मिलाएं और माँ दुर्गा को आहुति दें आपका बिजनेस खूब फलेगा

उपाय (4) :-जिन लोगों की विदेश यात्रा में कठिनाई या बाधा आ रही है |वो मूली के टुकड़ों को हवन सामग्री में मिला लें और हवन करें | विदेश यात्रा का योग बनेगा।

कैसे करें नवरात्रि की महाष्टमी पर चंडी हवन

कैसे करें नवरात्रि की महाष्टमी पर चंडी हवन
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यूं तो चंडी हवन किसी भी दिन व किसी भी समय संपन्न हो सकता है। लेकिन महाष्टमी के दिन हवन से पहले कुंड का पंचभूत संस्कार करें।

सर्वप्रथम कुश के अग्रभाग से वेदी को साफ करें। कुंड का लेपन करें गोबर जल आदि से। तृतीय क्रिया में वेदी के मध्य बाएं से तीन रेखाएं दक्षिण से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खींचें, चतुर्थ में तीनों रेखाओं से यथाक्रम अनामिका व अंगूठे से कुछ मिट्टी हवन कुण्ड से बाहर फेंकें। पंचम संस्कार में दाहिने हाथ से शुद्ध जल वेदी में छिड़कें। पंचभूत संस्कार से आगे की क्रिया में अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदेव का पूजन करें।
इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें : -

ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नेय न मम।
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ विष्णवे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम।
ॐ श्रियै स्वाहा। इदं श्रियै न मम।
ॐ षोडश मातृभ्यो स्वाहा। इदं मातृभ्यः न मम॥


नवग्रह के नाम या मंत्र से आहुति दें। गणेशजी की आहुति दें। सप्तशती या नर्वाण मंत्र से जप करें। सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के पश्चात स्वाहा का उच्चारण करके आहुति दें। प्रथम से अंत अध्याय के अंत में पुष्प, सुपारी, पान, कमल गट्टा, लौंग 2 नग, छोटी इलायची 2 नग, गूगल व शहद की आहुति दें तथा पांच बार घी की आहुति दें। यह सब अध्याय के अंत की सामान्य विधि है।

तीसरे अध्याय में गर्ज-गर्ज क्षणं में शहद से आहुति दें। आठवें अध्याय में मुखेन काली इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुति दें। पूरे ग्यारहवें अध्याय की आहुति खीर से दें। इस अध्याय से सर्वाबाधा प्रशमनम्‌ में कालीमिर्च से आहुति दें। नर्वाण मंत्र से 108 आहुति दें।