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शनिवार, 19 सितंबर 2015

आदि शक्ति देवी

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस संसार को बनाने वाली आदि शक्ति देवी हैं। लेकिन इसी देवी के अनगिनत रूप भी हैं, जैसे कि दुर्गा, सरस्वती, पार्वती, लक्ष्मी, इत्यादि। लोग इन्हें अलग-अलग कारणों से पूजते हैं तथा मनवांछित फल की प्राप्ति करते हैं।

लेकिन केवल पूजन के अलावा इन देवियों से मन्नत की पूर्ति के कई और तरीके भी शामिल हैं धर्म शास्त्रों में। कहते हैं साधना में अद्भुत शक्ति है जो किसी को हासिल हो जाए तो वह दुनिया में कुछ भी पा सकता है। एक देवी की साधना में जो शक्ति है वह दुनिया के किसी अन्य जीव, प्राणी या वस्तु में नहीं है।

लोग पैसे को सबसे बड़ी ताकत मानते हैं, लेकिन देवी की साधना में सफल होने से बड़ी ताकत किसी को आज तक हासिल नहीं हुई, ऐसा माना जाता है। आपने शायद बगलामुखी साधना के बारे में सुन रखा होगा, जिसकी मदद से आप किसी भी शत्रु से कुछ भी करवा सकते हैं। लेकिन इसके अलावा मां त्रिपुर सुंदरी से जुड़ी भी एक साधना है, जिसे करने से आप मनवांछित फल की प्राप्ति कर सकते हैं।

श्रावण (सावन) माह में शिवजी को प्रसन्न करने की हर संभव कोशिश की जाती है। लेकिन इसी समय ऐसी मान्यता है कि यदि माता त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जाए, तो भक्त कई परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार मां त्रिपुर सुंदरी भगवान शिव की ही पत्नी मां पार्वती का रूप हैं। इसलिए ऐसा माना जाता है कि मां पार्वती या उनके रूप को प्रसन्न करने का अर्थ है अपने आप ही शिव कृपा की प्राप्ति होना।

मां त्रिपुर संदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में आता है। यहां मां त्रिपुर सुंदरी देवी मंदिर बनाया गया है, जिसकी कहानियां और उसमें उपस्थित चीज़ें दूर-दूर से श्रद्धालुओं को इस मंदिर की ओर खींचकर ले जाती हैं। यह मंदिर मूलत: इस क्षेत्र के उमरई गांव में आता है, जहां पांचाल ब्राह्मणों की एक छोटी सी जनसंख्या रहती है।

कहते हैं मंदिर की कई कहानियां इन्हीं पांचाल ब्राह्मणों से ही जुड़ी हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कहानी भगवान शिव एवं उनकी पत्नी सती से जुड़ी है। सती द्वारा अग्नि कुंड में दाह और शिव द्वारा उनका शव लेकर आकाश में विचरण करते समय विष्णु के चक्र से सती के अंग-प्रत्यंग विभिन्न स्थानों पर गिरे थे। मां त्रिपुर सुंदरी का यह शक्तिपीठ वही स्थान है जहां सती की योनि गिरी थे।

तभी प्राचीनतम तस्वीरों में मां को योनावस्था में दर्शाया गया है। इस स्थान पर सती की योनि गिरने के पश्चात ही इस स्थान को अन्य शक्तिपीठों में गिना गया। लेकिन इस पौराणिक कथा के अलावा स्वयं इस क्षेत्र के ब्राह्मणों में भी इसी युग की एक कहानी प्रसिद्ध है।

यह बात विक्रम संवत् 1102 की है, जब मान्यतानुसार ऐसा कहा जाता है कि एक बार स्वयं मां सुंदरी ही भिखारिन का रूप धारण कर उस क्षेत्र के पांचाल लोगों के पास दीक्षा मांगने आई थीं। उस समय वे लोग खदान में काम कर रहे थे इसलिए उन्होंने भिखारिन को नजरअंदाज कर दिया, जिसके बाद वह वहां से चली गई।

लेकिन कहते हैं कि उसके जाने के ठीक बाद ही वह खदान ढह गई और सारे लोग उसमें दबकर मर गए। यह खदान आज भी वहीं है, जो मंदिर के पास ही बनी हुई है और स्थानीय लोगों में फटी खदान के नाम से प्रसिद्ध है। इस कहानी में कितनी सच्चाई है यह तो कोई नहीं जानता लेकिन लोगों में मान्यता यह है कि जो भी मां के इस शक्तिपीठ में आकर दिल से साधना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

यह साधना केवल श्रावण मास में ही करना लाभकारी माना गया है। नियमों के अनुसार यह साधना श्रावण मास आरंभ होने के पहले सोमवार से अगले सोमवार तक की जा सकती है, लेकिन इसे करने से पहले जातक के लिए ग्रहों की पूर्ण जानकारी होना अनिवार्य है।


मानव जीवन एवं शरीर नौ ग्रहों से प्रेरित होता है और यह नौ ग्रह चंद्रमा से बड़ी मात्रा में प्रभावित होते हैं। यह ग्रह चंद्रमा के जितने करीब होते हैं उसका उतना ही प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। मान्यतानुसार चंद्रमा के स्वामी हैं भगवान शिव, यही कारण है कि इस मास में शिवजी को प्रसन्न करने से हम जन्म कुंडली में चंद्रमा का स्थान उच्च कर सकते हैं। ऐसा करने से हमें राजसी सुख मिल सकते हैं और यश भी मिलता है।

लेकिन शिवजी के अलावा मां पार्वती के इस रूप को प्रसन्न करने के भी कई लाभ हैं। यही माह ऐसा है जब आप मां त्रिपुर सुंदरी की साधना से लाभ पा सकते हैं। इस साधना के लिए श्रावण मास के किसी भी, आमतौर पर पहले ही सोमवार से अगले सोमवार तक साधना की जा सकती है। प्रात: से लेकर रात्रि तक जो भी समय सुविधापूर्ण लगे, उसमें साधना की जा सकती है।


साधना काल के सप्ताह में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। साथ ही अनैतिक कृत्यों से भी बचना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे कि यह साधना केवल अपनी इच्छापूर्ति के लिए की जाए तो इतनी फलदायी नहीं होती, लेकिन यदि आप किसी अन्य की इच्छा पूर्ति के लिए इसे कर रहे हैं तो यह निश्चित ही फल प्रदान करती है।


शास्त्रों के अनुसार यह साधना मुश्किल नहीं है, लेकिन इसे नियम के अनुसार करना जरूरी है। इसे आरंभ करने से पहले स्नान आदि कर शुद्ध होकर सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद रेशमी या सफेद रंग के वस्त्र का आसन लें। एक सुपारी को कलावे से अच्छी तरह लपेटकर उसे एक थाली में सफेद वस्त्र के ऊपर रखें।

अब देवी पार्वती का ध्यान करते हुए उनसे प्रार्थना करते हुए उनसे उस सुपारी में अपना अंश प्रदान करने की प्रार्थना करें। यह क्रिया ग्यारह बार करें। इसे करने के बाद आपको सही उच्चारण करते हुए देवी का ध्यान मंत्र जाप करना है: बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों। नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।। हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती। श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

ध्यान मंत्र जाप के बाद एक आह्वान मंत्र भी पढ़ना है: ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि। मंत्र जाप के बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें। अब कमल गट्टे की माला लेकर 108 बार इस मंत्र का जप करें – “ऊं ह्रीं कं ऐ ई ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं स क ह ल ह्रीं।

यही प्रक्रिया आपको कुल सात दिनों तक दोहराते रहनी है। इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं होना चाहिए। सात दिनों तक साधना पूर्ण करके आठवें दिन खील, सफेद तिल, बताशे, बूरा, चीनी और गुलाब के फूल, बेल पत्र को एक साथ मिलाकर 108 आहूतियों से हवन करें। हवन के लिए मंत्र के आगे ऊं नम: स्वाहा: जोड़कर मंत्रोच्चार करें।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

कस्तूरी

कस्तूरी

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तंत्र प्रयोगों में कस्तूरी का एक विशेष स्थान है,और ऐसा कोई भी व्यक्ति नही होगा जो कि इसके विषय में जानता न हो,परन्तु अह असली मिलती ही नही। इसी कारण से तन्त्र प्रयोग करने पर इससे मिलने वाले लाभ प्रश्न ही बने रहते हैं। कस्तूरी प्राय: सर्वत्र उपलब्ध है और कस्तूरी कहने मात्र से पंसारी दे देता है। यह असली है या नकली यह प्रश्न बना ही रहता है,क्योकि इसके विषय में बहुत अधिक किसी को मालुम नही होता है,और कोई बताता भी नही है। कस्तूरी एक प्रकार के हिरन के कांटा आदि लगने के बाद बनने वाली गांठ के रूप में होती है,उस हिरन का खून उस गांठ में जम जाता है,और उसके अन्दर ही सूखता रहता है,जिस प्रकार से किसी सडे हुये मांस की बदबू आती है उसी प्रकार से उस हिरन के खून की बदबू इस प्रकार की होती है कि वह मनुष्यजाति को खुशबू के रूप में प्रतीत होती है। जिस हिरन से कस्तूरी मिलती है वह समुद्र तल से आठ हजार फ़ुट की ऊंचाई पर मिलता है,मुख्यत: इस प्रकार के हिरन हिमालय दार्जिलिंग नेपाल असम चीन तथा सोवियत रूस मे अधिकतर पाया जाता है,कस्तूरी केवल पुरुष जाति के हिरन में ही बनती है जो कि खुशबू देती है,मादा हिरन की कस्तूरी कुछ समय तो खुशबू देती है लेकिन शरीर से अलग होने के बाद सडने लग जाती है। दूसरे कस्तूरी प्राप्त करने के लिये कभी भी हिरन को मारना नहीं पडता है,वह गांठ जब सूख जाती है,तो पेडों के साथ हिरन के खुजलाने और चट्टानों के साथ अपने शरीर को रगडने के दौरान अपने आप गिर जाती है। इस गिरी हुई गांठ पर वन्य जीव भी अपनी नजर रखते है,और जब उनसे बच पाती है तो ही मनुष्य को मिलती है। अक्सर जो कंजर जाति के लोग कस्तूरी को बेचते है वे गीधड या सूअर के अंडकोष को सिल कर सुखा लेते है,और उनके सूखने पर उसके ऊपर कस्तूरी का नकली सेंट छिडकर बेचना शुरु कर देते है,भोले भाले लोग उनके चंगुल में आकर एक मरे हुये जानवर का अंग अपने घरों में संभाल कर रखते है और उसे बहुत ही पवित्र और उपयोगी वस्तु मानकर उसका प्रयोग करते है। नकली कस्तूरी को प्राप्त करने के और भी साधन होते है जैसे कि एक ओबीबस मस्केटस नामका सांड होता है जिसके शरीर से कस्तूरी जैसी ही सुगंध आती है,एक बत्तख भी होती है जिसे अनास मस्काटा कहते है,एक बकरा भी होता है जिसे कपरा आइनेक्स कहा जाता है,इसके खून में भी कस्तूरी जैसी सुगंध आती है,एक मगरमच्छ होता है जिसे क्रोकोवेल्गेरिस कहा जाता है,जिसके शरीर से भी कस्तूरी की तीव्र खुशबू आती है,आदि जीवों से भी कस्तूरी को विभिन्न तरीके से प्राप्त किया जाता है। बाजार में तीन प्रकार की कस्तूरी आती है,एक रूस की कस्तूरी,दूसरी कामरूप की कस्तूरी और तीसरी चीन की कस्तूरी,आप समझ गये होंगे कि किस जानवर का खून सुखाकर उसे कस्तूरी की कीमत में लोग बेच सकते होंगे।

कस्तूरी की पहिचान करने के तरीके

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कस्तूरी का दाना लेकर एक कांच के गिलास में डाल दें,दाना सीधा जाकर गिलास के तल में बैठ जायेगा,वह न तो गलेगा और न ही ढीला होगा। एक अंगीठी में कोयले दहकायें उस पर कस्तूरी का दाना डालें अगर नकली होगी तो वह जल कर धुंआ बन कर खत्म हो जायेगी,और असली होगी तो काफ़ी समय तक बुलबुले पैदा करने के बाद जलती रहेगी। एक सूती धागे को हींग के पानी में भिगोकर गीला कर लें और सुई में डालकर कस्तूरी के अन्दर से निकालें,अगर असली कस्तूरी होगी तो हींग अपनी खुशबू को छोड कर धागे में कस्तूरी की खुशबू भर जायेगी,वरना हींग की महक को मारने वाला और कोई पदार्थ नही है। एक पदार्थ होता है जिसे ट्रिनीट्रोब्यूटिल टोलबल कहते है इसकी महक भी कस्तूरी की तरह से होती है और काफ़ी समय तक टिकती है,कस्तूरी भारी होती है,कस्तूरी छूने में चिकनी होती है,कस्तूरी सफ़ेद कपडे में रखने के बाद पीला हो जाता है,कस्तूरी की नाप मटर के दाने के बराबर होती है,कहीं कहीं पर यह इलायची के दाने के बराबर भी पायी जाती है। इससे बडी कस्तूरी नही मिलती है।

गृध्रसी (साइटिका) का सफल इलाज:

गृध्रसी (साइटिका) का सफल इलाज:

लक्षण -
एक पैर मे पंजे से लेकर कमर तक दर्द होना गृध्रसी या रिंगण बाय कहलाता है।
प्रायः पैर के पंजे से लेकर कूल्हे तक दर्द होता है जो लगातार होता रहता है। मुख्य लक्षण यह है कि दर्द केवल एक पैर मे होता है। दर्द इतना अधिक होता है कि रोगी सो भी नहीं पाता।
चिकित्सा - ये चिकित्सा मैंने बार बार अनुभव की है। बहुत अधिक परेशानी मे मे भी 3 दिन मे फायदा हो जाता है स्थायी लाभ के लिए 10-15 दिन जरूर प्रयोग करें। कई बार ये दवाई बाद मे बेअसर हो जाती है। एसी स्थिति मे पत्तों की मात्रा बढ़ा दे।

हारसिंगार = पारिजात के 10-15 कोमल पत्ते को कटे फटे न हों तोड़ लाएँ। पत्ते को धो कर मिक्सी मे या कैसे ही थोड़ा सा कूट ले या पीस ले। बहुत अधिक बारीक पीसने कि जरूरत नहीं है। लगभग 200-300 ग्राम पानी (2 कप) मे धीमी आंच पर उबालें। तेज आग पर मत पकाए। चाय की तरह पकाए। चाय कि तरह छान कर गरम गरम पानी (काढ़ा) पी ले। पहली बार मे ही 10% फायदा होगा। प्रतिदिन 2 बार पिए । यदि आप ऑफिस जाते हैं तो दोगुना पानी उबाले।
थर्मस मे भरकर ले जाएँ। इस हरसिंगार के पत्तों के काढ़े से 15 मिनट पहले और 1 घंटा बाद तक ठंडा पानी न पीए। दही लस्सी और आचार न खाएं। बार बार प्रयोग किया है । कभी असफल नहीं हुआ।

पारिजात एक पुष्प देने वाला वृक्ष है। इसे परिजात, हरसिंगार, शेफाली, शिउली आदि नामो से भी जाना जाता है।